
SHREE SHARMA
228 days ago
🌞 मकर संक्रांति पर धर्मराज की दिव्य कथा 🌞 एक समय पृथ्वीलोक पर बबरुवाहन नामक एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसके राज्य में धन-धान्य, सुख-समृद्धि और शांति की कोई कमी नहीं थी। उसी राज्य में हरिदास नामक एक विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे। उनकी पत्नी गुणवती अत्यंत धर्मपरायण, पतिव्रता और सद्गुणों से युक्त नारी थीं। गुणवती ने अपना संपूर्ण जीवन देवी-देवताओं की उपासना, व्रत, दान-पुण्य और सेवा में अर्पित कर दिया था। अतिथि सेवा को वह अपना परम धर्म मानती थीं। दीन-दुखियों की सहायता, ब्राह्मणों का सम्मान और सत्य आचरण उनके जीवन का मूल आधार था। इसी प्रकार प्रभु-भक्ति करते हुए जब गुणवती वृद्धावस्था को प्राप्त हुईं, तो एक दिन उनका देहांत हो गया। मृत्यु के पश्चात धर्मराज के दूत उन्हें सम्मानपूर्वक यमलोक ले गए। यमलोक में एक दिव्य और स्वर्णिम सिंहासन पर यम धर्मराज विराजमान थे। उनके समीप चित्रगुप्त जी प्राणियों के कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर रहे थे। तभी यमदूत गुणवती को लेकर दरबार में उपस्थित हुए। धर्मराज को देखकर गुणवती थोड़ी भयभीत हो गईं और सिर झुकाकर विनम्रता से खड़ी हो गईं। चित्रगुप्त जी ने उनके संपूर्ण जीवन का विवरण धर्मराज को सुनाया। गुणवती के सत्कर्म सुनकर धर्मराज प्रसन्न तो हुए, परंतु उनके मुख पर हल्की सी उदासी छाई हुई थी। यह देखकर गुणवती ने हाथ जोड़कर कहा— “हे प्रभु! मैंने जीवनभर धर्म, व्रत, दान और सेवा ही की है। फिर भी आपके मुख पर उदासी क्यों है? मुझसे कौन-सी भूल हो गई?” धर्मराज बोले— “हे देवी! तुमने सभी देवी-देवताओं की उपासना की, व्रत किए और पुण्य कर्म किए, परंतु कभी मेरे नाम से पूजा, पाठ या दान नहीं किया।” यह सुनकर गुणवती अत्यंत व्याकुल हो गईं और क्षमा याचना करते हुए बोलीं— “हे प्रभु! मुझे आपकी पूजा का ज्ञान नहीं था। कृपा करके ऐसा उपाय बताइए जिससे मनुष्य आपकी कृपा प्राप्त कर सके। मैं मृत्यु लोक में लौटकर आपकी भक्ति करना चाहती हूँ और इस व्रत का प्रचार करना चाहती हूँ।” तब धर्मराज ने कहा— “जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं, अर्थात् मकर संक्रांति के दिन, मेरी पूजा प्रारंभ करनी चाहिए। उस दिन से पूरे एक वर्ष तक मेरी कथा सुननी चाहिए और धर्म के दस नियमों का पालन करना चाहिए।” धैर्य और संतोष रखना मन को वश में रखना और क्षमा भाव रखना किसी भी प्रकार का दुष्कर्म न करना मानसिक व शारीरिक शुद्धता बनाए रखना इंद्रियों पर नियंत्रण रखना बुरे विचारों से दूर रहना पूजा, पाठ और दान-पुण्य करना व्रत रखना और कथा सुनना सत्य बोलना और सद्व्यवहार करना क्रोध का त्याग करना एक वर्ष पूर्ण होने पर अगली मकर संक्रांति को व्रत का उद्यापन करें। धर्मराज और चित्रगुप्त की प्रतिमा बनाकर विधि-विधान से पूजा, हवन करें और काले तिल के लड्डुओं का भोग लगाएं। इसके पश्चात— ब्राह्मण भोज कराएं बाँस की टोकरी में 5 सेर अनाज दान करें जरूरतमंदों को कंबल, गद्दा, तकिया, वस्त्र, लोटा आदि दान करें संभव हो तो गौदान अवश्य करें यह संपूर्ण कथा सुनकर गुणवती ने पुनः धर्मराज से प्रार्थना की— “हे प्रभु! मुझे पुनः मृत्यु लोक में जाने की अनुमति दें, जिससे मैं इस व्रत का पालन कर सकूँ और लोगों को इसका महत्व समझा सकूँ।” धर्मराज ने उन्हें पुनः पृथ्वी लोक भेज दिया। धरती पर आकर गुणवती ने अपने पति को यह व्रत बताया और मकर संक्रांति के दिन दोनों ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन किया। इस व्रत के प्रभाव से धर्मराज प्रसन्न हुए और अंततः दोनों को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

Comments (2)

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
Jan 14, 2026
ॐ श्री गणेशाय नमः! 🙏🕉️ शुभरात्रि वंदन जी! 🌙🙏 भगवान गणेश की कृपा और आशीर्वाद आप पर सदा बना रहे। आपको शांत और सुखद नींद मिले, और कल नया दिन नई खुशियां लेकर आए। 🌟💤 जय गणेश! 🙏🕉️ शुभ रात्रि! 🌃💫

