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SHREE SHARMA

211 days ago

मन की व्याख्या, भोर वंदना, दोहों के साथ 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 ईश भोर की वंदना, प्रभु के पावन द्वार। मन से करना प्रार्थना, प्रभु करते स्वीकार।। मन शरीर के संग है, नहीं हृदय संबंध। आत्मा स्वामी और है, उठती जहाँ सुगंघ।। मन शरीर का सारथी, कहते नित सद्ग्रंथ। रीति प्रणाली प्रीत की,संप्रदाय का पंथ।। मन की समस्त इंद्रियों, रहती है बेचैन। व्याकुल होता जीव है, भटक रहे दो नैन।। जीवन के फिर अंत तक, फैला रहता जाल। नाच नचाये मन सदा, बदले मानव चाल।। अपने भीतर देखना, भूल गया भगवान। करे नहीं आराम नर, भूल गया यशगान।। आत्म ज्योति भीतर जले, भूल गया इंसान। मन कहता करता चले, भूल गया सम्मान।। जीवन को खंगालते, बाकी बचते लोग। लगा रहे मन आपका, ईश्वर का संजोग।। नंदन वंदन हे प्रभो, मन करता तत्काल। स्वर्ग मिले सम्मान नर, करते प्रभो मलाल।। आत्मा परमात्मा मिले, होता प्राणी अंत। मन की व्याख्या कह रहा, योगी भावुक संत।। कहते दीन दयाल है, गीता का यह सार। भक्ति ग्रंथ स्वीकार कर, मन छोड़े विस्तार।। •••••••••••••••••••••••••••••••••••

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Comments (2)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

Jan 31, 2026

🙏 शुभ शनिवार जी 🙏 आपको और आपके परिवार को शनिवार की शुभकामनाएं! 🌞💫 भगवान की कृपा और आशीर्वाद से आपका दिन मंगलमय और सफलतापूर्ण हो। 🙏💫 जय सिया राम जी 🙏 🌞😊