
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
173 days ago
यमुना जी के किनारे की तो बात ही निराली है! ब्रज की इस पावन नदी का हर घाट और हर लहर श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी क्रीड़ाओं की साक्षी रही है। यमुना तट पर उनकी कुछ सबसे सुंदर और दिव्य लीलाएँ इस प्रकार हैं: 1. वंशीवट की मधुर तान यमुना के किनारे स्थित वंशीवट वह स्थान है जहाँ कान्हा अपनी बाँसुरी बजाते थे। कहते हैं कि जब कृष्ण की मुरली बजती थी, तो यमुना जी की धारा भी थम जाती थी और श्री राधा रानी सब काम छोड़कर दौड़ी चली आती थीं। वहाँ का खेल केवल शब्दों का नहीं, सुरों और भावों का होता था। 2. चीर हरण और हास-परिहास यमुना के घाटों पर गोपियों और राधा जी के साथ कान्हा की वह नटखट छेड़छाड़, जहाँ वे उनकी मटकियाँ फोड़ देते या सखियों को चिढ़ाते थे। यह सब प्रेम की एक ऐसी डोर थी जो केवल ब्रजवासी ही समझ सकते थे। 3. महारास का आरंभ पूर्णिमा की रात को यमुना के रेतीले किनारों पर ही महारास रचा जाता था। जहाँ हर गोपी को लगता था कि कान्हा केवल उनके साथ नाच रहे हैं, लेकिन वास्तव में कान्हा का पूरा ध्यान अपनी स्वामिनी, श्री राधा जी पर ही होता था। 4. कदम्ब के पेड़ की ओट यमुना किनारे लगे कदम्ब के वृक्षों पर चढ़कर कान्हा अक्सर राधा जी का मार्ग रोकते थे। उन शीतल हवाओं में यमुना की लहरों के साथ उनका लुका-छिपी खेलना आज भी भक्तों के मन को शांति देता है। > "यमुना तट पर विचरत दोऊ, अद्भुत छवि को पार न कोऊ।" > राधे-राधे! श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की बाल लीलाओं में उनका साथ खेलना सबसे मधुर और पावन प्रसंग माना जाता है। ब्रज की गलियों और निकुंजों में उनकी खेल-लीलाएं प्रेम और भक्ति का सबसे सुंदर स्वरूप हैं। उनके साथ खेलने की कुछ अद्भुत झलकियाँ इस प्रकार हैं: * होली की लीला: बरसाने और नंदगाँव की वह प्रसिद्ध होली, जहाँ कान्हा अपनी टोली के साथ राधा रानी और गोपियों के साथ रंगों का खेल खेलते हैं। यह खेल केवल रंगों का नहीं, बल्कि भक्ति के आनंद का प्रतीक है। * पनघट की छेड़छाड़: यमुना के तट पर जब श्री राधा रानी जल भरने जाती थीं, तब कान्हा का उनके साथ ठिठोली करना और मटकी फोड़ना, भक्तों के हृदय को आज भी आनंद से भर देता है। * गेंद का खेल (कंदुक क्रीड़ा): सखाओं और सखियों के साथ गेंद खेलना, जिसमें हार-जीत का कोई मोल नहीं होता था, बस एक-दूसरे का साथ और प्रेम ही मुख्य होता था। * लुका-छिपी: वनों में एक-दूसरे को ढूंढना और पकड़े जाने पर वह निश्छल मुस्कान ब्रज के कण-कण को धन्य कर देती थी। इन लीलाओं की सुंदरता इसी में है कि भगवान होकर भी वे भक्त के प्रेम में बंधकर एक बालक की तरह खेलते हैं।
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