
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
8 hours ago
स्वर्ग में जब अमृत बँट रहा था, तब एक ऐसी देवी भी थीं जिन्होंने अमृत का घूँट पीने से साफ इनकार कर दिया! आख़िर क्या था उस देवी का रहस्यमयी संकल्प, जिसे सुनकर स्वयं भगवान विष्णु भी नतमस्तक हो गए? क्षीरसागर के मंथन से जब चौदह रत्न निकले, तो अंत में भगवान धन्वंतरि अपने कर-कमलों में दिव्य अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। असुरों को मोहित करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और देवताओं को अमृत पान कराने लगे। देवता पंक्तिबद्ध होकर उस अमृत की एक-एक बूँद के लिए तरस रहे थे, क्योंकि जो उस अमृत को चख लेता, वह सदा के लिए अमर, अजर और रोगमुक्त हो जाता।उसी देव-सभा में सूर्यदेव की परम विदुषी और तपस्वी पुत्री सुवर्चला भी उपस्थित थीं। जब मोहिनी रूपी भगवान विष्णु अमृत का स्वर्ण-पात्र लेकर देवी सुवर्चला के सम्मुख पहुँचे, तो उन्होंने अमृत की कटोरी आगे बढ़ा दी। परंतु सुवर्चला ने अपने दोनों हाथ पीछे खींच लिए। उन्होंने अपना मस्तक झुकाया और अत्यंत शांत स्वर में कहा: "हे प्रभु! मुझे क्षमा करें। मैं इस अमृत का एक भी कण अपने कंठ से नीचे नहीं उतारूँगी पूरी देव-सभा में सन्नाटा छा गया इंद्र, वरुण, अग्नि और स्वयं देवगुरु बृहस्पति चौंक उठे। इंद्र ने कहा—देवी सुवर्चला! यह क्या मूर्खता है? जिस अमृत के लिए देव-दानवों का भयंकर रक्तपात हुआ, तुम उसे ठुकरा रही हो? अमरता का यह अवसर ब्रह्मांड में दोबारा नहीं मिलेगा! मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ पूछा: हे कल्याणी! देवता, नाग और यक्ष इस अमृत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं। तुम किस कारण से इस परम पेय को त्याग रही हो?देवी सुवर्चला ने हाथ जोड़कर पूरी देव-सभा की ओर देखा और कहा:हे जगत्पति! अमरता यदि केवल अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए हो, तो वह एक जड़ पत्थर बनने के समान है। यह अमृत पीकर देवता अमर हो जाएँगे, रोगमुक्त हो जाएँगे। परंतु जब मृत्युलोक में मनुष्य, पशु और पक्षी जन्म-मृत्यु के चक्र में तड़पेंगे, रोगों से चीत्कार करेंगे, तब हम अमर होकर स्वर्ग में केवल उनका तमाशा देखेंगे?जब किसी प्राणी को भूख लगेगी, तो क्या मेरी अमरता उसकी क्षुधा मिटा पाएगी? जो सत्ता दुख को महसूस ही न कर सके, वह अमर होकर भी मृतप्राय है! सुवर्चला ने आगे कहा: प्रभु! यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो मुझे वह जल दीजिए जो इस मंथन के विष को शांत करने के बाद महादेव के कंठ से टपका था मुझे अमरता नहीं चाहिए, मुझे 'सहानुभूति' का वरदान चाहिए। जब भी मृत्युलोक का कोई जीव अपनी पीड़ा में रोए, तो उसका एक अंश मेरे हृदय को भी स्पर्श करे, ताकि मैं उनके निवारण का मार्ग बन सकूँ सुवर्चला की यह बात सुनकर अमृत पी रहे कई देवताओं के हाथ की कटोरियाँ कांपने लगीं। उन्हें अपनी अमरता के पीछे छिपा स्वार्थ स्पष्ट दिखाई देने लगा। भगवान विष्णु ने तुरंत अपना मोहिनी रूप समेटा और अपने चतुर्भुज नारायण स्वरूप में प्रकट हो गए भगवान के नेत्रों में उस देवी के प्रति अगाध आदर था। श्रीहरि ने कहा: देवी सुवर्चला! जिसने अपने भीतर के स्वार्थ और मृत्यु के भय को जीत लिया, उसे किसी औषधि या अमृत की आवश्यकता नहीं होती। वह तो स्वयं चेतना रूप हो जाता है। तुमने अमृत का त्याग करके ब्रह्मांड के सबसे बड़े तत्व 'करुणा' को चुना है।भगवान विष्णु ने वरदान दिया: यह अमृत पीने वाले देवता एक कल्प के बाद पुनः अपने पदों से च्युत हो सकते हैं, परंतु तुम्हारा यह करुणामयी स्वरूप कभी नष्ट नहीं होगा। तुम आकाश में उस 'स्वाति' और 'तपस्या' की ज्योति बनकर चमकोगी, जिसकी एक बूँद सीपी में गिरकर मोती बन जाती है। तुम्हारा नाम अमरता से नहीं, बल्कि त्याग और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में युगों-युगों तक स्मरण किया जाएगा। !!जय श्री #कृष्णा!!

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