
SHREE SHARMA
263 days ago
ऐसा कौन सा कुआं है, जिसमें गिरने के बाद इंसान कभी बाहर नहीं निकल पाता? एक बार राजा भोज के दरबार में यह यक्ष प्रश्न उठा। बड़े-बड़े विद्वान निरुत्तर हो गए। राजा ने अपने राजपंडित को सात दिन का अल्टीमेटम दिया: "या तो जवाब लाओ, या फिर राज्य छोड़कर जाओ और अब तक मिला सारा सम्मान वापस करो।" छः दिन बीत गए। हताश राजपंडित जंगल में भटक रहा था, जहाँ उसकी भेंट एक साधारण से दिखने वाले गड़रिए से हुई। पंडित की उदासी देख गड़रिए ने कारण पूछा। पहले तो पंडित को अहंकार आया, पर मजबूरी में उसने समस्या बता दी। गड़रिया मुस्कुराया और बोला, "मेरे पास 'पारस' पत्थर है। मैं तुम्हें दे दूंगा, तुम जितना चाहे सोना बना लेना। राजा क्या, पूरी दुनिया तुम्हारे पीछे घूमेगी। लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं।" लोभ में अंधे पंडित ने पूछा, "क्या शर्तें हैं?" गड़रिया: "तुम्हे मेरा चेला बनना होगा। फिर भेड़ का दूध पीना होगा। उसके बाद, मैं उस दूध को झूठा करूँगा, तुम्हें वही पीना होगा।" पंडित का अहंकार और ब्राह्मणत्व आड़े आया, पर 'पारस' के लोभ ने उसे झुकने पर मजबूर कर दिया। वह तैयार हो गया। फिर गड़रिए ने अंतिम और सबसे कठिन शर्त रखी: "सामने जो इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, मैं उसमें दूध दोहूंगा, उसे कुत्ते से चटवाऊंगा, और फिर तुम्हें वह पीना होगा। तभी पारस मिलेगा।" राजपंडित काँप उठा। यह घोर अपमान था। लेकिन आँखों के सामने सोने का पहाड़ तैर रहा था। उसने खूब विचार किया और अंततः अपनी आत्मा को मारकर बोला- "मैं तैयार हूँ।" यह सुनते ही गड़रिया जोर से हँसा और बोला- "मिल गया जवाब पंडित जी! यही तो है वह गहरा कुआं!" राजपंडित हैरान रह गया। गड़रिए ने समझाया: "यह 'लोभ' और 'तृष्णा' का कुआं है। जैसे पारस पाने के लोभ में तुम एक के बाद एक अपनी मर्यादा, धर्म और आत्मसम्मान खोते हुए इस कुएं में गिरते चले गए, वैसे ही इंसान इस संसार में फंसता है।" शिक्षा :: हम सभी इस सांसारिक मायाजाल में ऐसे लिप्त हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल जाते हैं। "बस थोड़ा और, बस थोड़ा और" का यह लोभ एक ऐसा अंतहीन कुआं है, जिसमें गिरने के बाद वापसी का रास्ता नहीं मिलता। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

Comments (2)

Balraj Sethi Balraj Sethi
Dec 10, 2025
Om Jai Shree Radhe Krishna Ji Ki. 🙏🏻🌷

Prem chand shami
Dec 10, 2025
very nice pic 👌 👍 Radhey Radhey ji 🌹 ❤️ 🙏
