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भगवान जगन्नाथ की कथा अत्यंत प्राचीन और हृदयस्पर्शी है, जो भक्ति, समर्पण और दिव्यता का संगम है। यह कथा मुख्य रूप से राजा इंद्रद्युम्न और नील माधव के प्रसंग से जुड़ी है। 1. नील माधव की खोज पौराणिक कथाओं के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें पता चला कि नील पर्वत (ओडिशा) की कंदराओं में भगवान 'नील माधव' के रूप में निवास करते हैं, जिनकी पूजा विश्ववसु नामक एक सबर (आदिवासी) मुखिया चोरी-छिपे करते हैं। * राजा ने अपने ब्राह्मण मंत्री विद्यापति को खोज के लिए भेजा। * विद्यापति ने विश्ववसु की पुत्री से विवाह किया और अंततः आंखों पर पट्टी बांधकर नील माधव के दर्शन किए। * हालांकि, उन्होंने चालाकी से रास्ते में राई के दाने गिरा दिए थे, ताकि बाद में वे उस स्थान को ढूंढ सकें। 2. भगवान का अंतर्ध्यान होना जब राजा इंद्रद्युम्न वहां पहुंचे, तो भगवान नील माधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। राजा अत्यंत दुखी हुए। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान अब विग्रह (मूर्ति) के रूप में प्रकट होंगे, लेकिन नील माधव के रूप में नहीं, बल्कि दारु-ब्रह्म (लकड़ी के रूप) में। 3. दिव्य वृक्ष और वृद्ध कारीगर एक रात राजा को स्वप्न आया कि समुद्र में एक विशाल दिव्य लकड़ी का लट्ठा (दारु) तैर रहा है, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न हैं। राजा ने उस लकड़ी को निकलवाया। विग्रह बनाने के लिए कई शिल्पकार आए, लेकिन उनकी छेनी टूट जाती थी। अंततः स्वयं भगवान विष्णु एक वृद्ध मूर्तिकार (विश्वकर्मा) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने एक शर्त रखी: > "मैं 21 दिनों में मूर्तियों का निर्माण करूँगा, लेकिन इस दौरान मंदिर के द्वार बंद रहेंगे। यदि कोई अंदर आया, तो मैं काम अधूरा छोड़ दूँगा।" > 4. अधूरा विग्रह और अनन्य भक्ति लगभग 15 दिन बीतने के बाद मंदिर के अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। राजा की रानी गुंडिचा को लगा कि मूर्तिकार की मृत्यु हो गई है। व्याकुल होकर राजा ने मंदिर का द्वार खोल दिया। * शर्त टूटने के कारण वृद्ध मूर्तिकार अदृश्य हो गया। * सामने तीन अधूरी मूर्तियां थीं—जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा। उनके हाथ-पैर पूरे नहीं बने थे और आँखें बड़ी-बड़ी थीं। * राजा बहुत पछताए, लेकिन फिर आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर भक्तों को दर्शन देना चाहते हैं। जगन्नाथ जी के रूप की कुछ मुख्य विशेषताएं: | विशेषता | महत्व | |---|---| | अधूरी मूर्तियां | यह दर्शाती हैं कि भगवान बिना हाथ-पैर के भी संपूर्ण जगत का पालन कर सकते हैं। | | बड़ी आंखें | यह 'चका डोला' कहलाती हैं, जो संकेत देती हैं कि भगवान सदैव अपने भक्तों पर नजर रखते हैं। | | नीम की लकड़ी | इनका निर्माण विशेष नीम की लकड़ी (दारु) से होता है, जिसे हर 12 साल में बदला जाता है (नवकेलेवर)। | आज भी पुरी का जगन्नाथ मंदिर श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ ऊंच-नीच का भेद भुलाकर हर वर्ष भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है।

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