
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
160 days ago
*भगवान शंकर ने ही (हलाहल) विष, को क्यों ? पीया कोई और देव भी पी सकते थे l* *समुद्र मंथन के दौरान जब 'हलाहल' विष निकला, तो उसकी तीव्रता इतनी अधिक थी कि वह पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था। भगवान शिव द्वारा इसे पीने के मुख्य पौराणिक और आध्यात्मिक कारण निम्नलिखित हैं:* *सृष्टि की रक्षा की क्षमता: शिव पुराण के अनुसार, केवल भगवान शिव में ही उस कालकूट या हलाहल विष की प्रचंड अग्नि और शक्ति को सहन करने का सामर्थ्य था। अन्य देवता और असुर इसकी गंध और ताप से ही मूर्छित होने लगे थे।* *विष्णु और ब्रह्मा की अन्य भूमिकाएँ: समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने 'कूर्म अवतार' धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला हुआ था, जबकि ब्रह्मा जी संतुलन बनाए रखने में व्यस्त थे। ऐसे में केवल शिव ही उस समय उस संकट को दूर करने के लिए उपलब्ध और सक्षम थे।* *परम संहारक और करुणा: शिव को 'संहारक' माना जाता है, जो नकारात्मकता को नष्ट या समाहित करने की शक्ति रखते हैं उन्होंने किसी व्यक्तिगत लाभ या प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रति अपनी 'अनंत करुणा' और कर्तव्य के कारण इसे पीना स्वीकार किया।* *अजन्मा और अनादि तत्व: आध्यात्मिक रूप से शिव को 'अजन्मा' और 'अनादि' माना जाता है, जिन पर जीवन और मृत्यु का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे अग्नि स्वरूप (रुद्र) हैं, जो किसी भी तत्व को भस्म या समाहित कर सकते हैं।* *नियति और वेदों की वाणी: यजुर्वेद में शिव को 'नीलकंठ' (नीले गले वाला) बताया गया है। इस पौराणिक घटना ने उस वैदिक कथन को सत्य सिद्ध किया, क्योंकि यह पहले से ही नियति में निर्धारित था।* *भगवान शिव ने विष को पूरी तरह निगला नहीं था, बल्कि माता पार्वती के सहयोग से उसे अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया था, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।* *भगवान शिव का जलाभिषेक केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व है:* *विष की ज्वाला को शांत करना: समुद्र मंथन के दौरान जब शिवजी ने हलाहल विष पिया, तो उनके शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया और कंठ में तीव्र जलन होने लगी। इस ताप को कम करने और उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर गंगाजल अर्पित किया था।* *निरंतर शीतलता (गलंतिका): मंदिरों में शिवलिंग के ऊपर पानी का एक कलश लटका होता है जिससे बूंद-बूंद जल गिरता रहता है, जिसे 'गलंतिका' कहते हैं। इसका उद्देश्य शिवजी के शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखना है।* *संकट हरने का प्रतीक: मान्यता है कि जलाभिषेक से प्रसन्न होकर महादेव भक्त के जीवन के 'विष' (कष्ट और पाप) को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और उसे सुख-शांति का आशीर्वाद देते हैं।* *सावन का विशेष महत्व: चूंकि विषपान की घटना श्रावण मास में हुई थी, इसलिए इस महीने में जलाभिषेक का फल अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है।* *आध्यात्मिक शुद्धि: यह अनुष्ठान भक्त के मन और आत्मा की शुद्धि तथा अहंकार के त्याग का प्रतीक है।* *शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।*

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