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*🌹जब रूठी पत्नी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ को खिलानी पड़ी मिठाई, जानिए क्या है रथ यात्रा की ये अनोखी रस्म🌹* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 *⭕भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा का समापन एक बेहद ही खूबसूरत और अनोखी परंपरा के साथ होता है. इस अंतिम और सबसे जरूरी रस्म को नीलाद्रि बीजे कहा जाता है.* *आम तौर पर लोग सोचते हैं कि रथ यात्रा सिर्फ रथ खींचने तक ही सीमित है, लेकिन असल में इसके बाद की रस्में भी उतनी ही दिलचस्प हैं.* *नौ दिनों तक अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर में रहने के बाद जब भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा वापस अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं, तो उसी दिन को नीलाद्रि बीजे कहा जाता है.* *इस दिन पुरी में सिर्फ भगवान की घर वापसी की खुशी ही नहीं मनाई जाती, बल्कि पति पत्नी के प्यारे से झगड़े और मीठे से मिलन की एक अनोखी कहानी भी जीवंत हो उठती है.* *🪔क्या होता है नीलाद्रि बीजे?* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 आसान शब्दों में समझें तो नीलाद्रि का मतलब होता है वह नीला पर्वत जिस पर भगवान जगन्नाथ का मुख्य मंदिर बना हुआ है. वहीं बीजे शब्द का सीधा सा अर्थ होता है दोबारा प्रवेश करना या अपनी जगह पर बैठना. जब भगवान अपनी यात्रा पूरी करके वापस मुख्य मंदिर के गर्भगृह में कदम रखते हैं, तो उसे ही नीलाद्रि बीजे का नाम दिया गया है. रथ यात्रा शुरू होने के बाद से लेकर इस दिन तक कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान चलते रहते हैं. जब भगवान वापस आकर अपने मुख्य रत्न सिंहासन पर बैठ जाते हैं, तभी जाकर पूरी रथ यात्रा का त्योहार आधिकारिक रूप से पूरा माना जाता है. *🪔लक्ष्मी जी की नाराजगी की कहानी* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 इस दिन के साथ एक बहुत ही मजेदार और प्यारी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि जब भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा पर निकले, तो वे अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को तो साथ ले गए, लेकिन पत्नी माता लक्ष्मी को घर पर ही छोड़ गए. बस इसी बात पर माता लक्ष्मी बुरी तरह नाराज हो गईं. जब नौ दिन बाद भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर पहुंचे, तो लक्ष्मी जी ने गुस्से में आकर मंदिर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. उन्होंने भगवान जगन्नाथ को साफ कह दिया कि वे उन्हें मंदिर के अंदर आने नहीं देंगी. *🪔रसगुल्ले से बनी बात* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 दरवाजा बंद होने के बाद भगवान जगन्नाथ बाहर ही खड़े रह गए. अब अपनी रूठी हुई पत्नी को मनाना तो भगवान के लिए भी जरूरी था. माता लक्ष्मी का गुस्सा शांत करने के लिए भगवान जगन्नाथ ने एक बहुत ही मीठा तरीका अपनाया. उन्होंने माता लक्ष्मी को मनाने के लिए उड़ीसा की सबसे मशहूर मिठाई यानी रसगुल्ला भेंट किया. रसगुल्ले की मिठास और भगवान जगन्नाथ का इतना प्रेम देखकर माता लक्ष्मी का सारा गुस्सा पल भर में गायब हो गया. उन्होंने मुस्कुराते हुए मंदिर के कपाट खोल दिए. यही वजह है कि आज भी इस रस्म के दौरान भगवान को रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है. *🪔इस दिन क्या क्या होता है?* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 नीलाद्रि बीजे के दिन पुरी मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ जुटने लगती है. सबसे पहले तीनों देवी देवताओं को बड़े ही आदर और सुरक्षा के साथ रथों से उतारकर मुख्य मंदिर के अंदर ले जाया जाता है. पंडित और पुजारी खास मंत्रोच्चार करते हुए भगवान के विग्रहों को गर्भगृह तक पहुंचाते हैं. इसके बाद भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के बीच होने वाले इस मीठे झगड़े और मिलन की पूरी कहानी को नाटक के रूप में मंदिर के सामने दोहराया जाता है. भगवान को ढेर सारे रसगुल्लों का भोग लगता है और फिर विशेष आरती के साथ इस पावन उत्सव का समापन हो जाता है. *🚩#जय_जगन्नाथ🚩* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻 💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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