
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
161 days ago
यह एक बहुत ही गंभीर और कड़वी सच्चाई है। जिस दवा की आप बात कर रहे हैं, उसका नाम डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) है। यह साधारण और सस्ती दवा पशुओं के दर्द और सूजन के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन गिद्धों (Vultures) के लिए यह एक साइनाइड के समान ज़हर साबित हुई। कैसे हुई इतनी बड़ी तबाही? * किडनी फेलियर: जब पशुओं को यह दवा दी जाती थी और उनकी मृत्यु के बाद गिद्ध उनके शव को खाते थे, तो यह दवा गिद्धों के शरीर में चली जाती थी। गिद्धों का शरीर इस दवा को झेल नहीं पाता और उनकी किडनी (गुर्दे) चंद घंटों में काम करना बंद कर देती थी। * आंकड़े: 1990 के दशक के अंत तक भारत में गिद्धों की आबादी में 99% तक की गिरावट देखी गई। जो गिद्ध कभी आसमान में हज़ारों की संख्या में दिखते थे, वे विलुप्ति की कगार पर पहुँच गए। * पारिस्थितिक संकट: गिद्धों के न रहने से सड़े हुए मांस को खाने वाला कोई नहीं बचा, जिससे आवारा कुत्तों की आबादी बढ़ी और रेबीज जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ गया। वर्तमान स्थिति और समाधान इस बड़ी त्रासदी के बाद सरकार और वैज्ञानिकों ने कुछ कड़े कदम उठाए: * बैन: भारत सरकार ने 2006 में पशु चिकित्सा के लिए डाइक्लोफेनाक पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। * सुरक्षित विकल्प: अब पशुओं के लिए मेलॉक्सिकैम (Meloxicam) और टोलफेनैमिक एसिड जैसी दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो गिद्धों के लिए सुरक्षित हैं। * संरक्षण केंद्र: हरियाणा के पिंजौर और देश के अन्य हिस्सों में 'गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र' खोले गए हैं ताकि इनकी आबादी को फिर से बढ़ाया जा सके। प्रकृति में हर जीव की अपनी एक अहमियत होती है, और एक छोटी सी मानवीय चूक पूरे ईकोसिस्टम को कैसे हिला सकती है, यह उसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
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