
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
204 days ago
सुप्रभात! बहुत ही सुंदर और गहरा विचार साझा किया स्वामी प्रेमानंद महाराज जी की वाणी हमेशा जीवन का सही मार्गदर्शन करती है। **ईर्ष्या (दूसरों की उन्नति देख जलना), दोष (दूसरों में कमियां ढूंढना) और अभिमान (स्वयं को श्रेष्ठ समझना)**—ये तीनों विकार वास्तव में मन के उस दर्पण को धुंधला कर देते हैं, जिसमें परमात्मा का प्रतिबिंब दिखना चाहिए। जब तक मन में 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार रहता है, तब तक वहां 'हरि' का वास कठिन होता है। जैसा कि संत कहते हैं: *"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।"* आज का दिन आपके लिए मंगलमय और भक्तिपूर्ण हो! 🙏✨

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