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राधा-कृष्ण का मिलन केवल दो प्रेमियों का मिलन नहीं, बल्कि यह **आत्मा और परमात्मा के एकाकार होने का प्रतीक** है। राधा-कृष्ण का प्रेम निस्वार्थ, पवित्र और बंधनमुक्त है। उनके इस संबंध में जो गहराई और त्याग है, वह संसार को प्रेम की एक अलौकिक परिभाषा देता है: * **समर्पण:** राधा जी का कृष्ण के प्रति प्रेम 'अहं' के विसर्जन का नाम है। जहाँ 'मैं' समाप्त होता है, वहीं प्रेम का उदय होता है। * **अद्वैत:** शास्त्रों में कहा गया है कि राधा और कृष्ण दो नहीं, एक ही हैं। जैसे फूल और उसकी सुगंध को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही उन्हें अलग नहीं देखा जा सकता। * **दिव्यता:** यह प्रेम भौतिक आकर्षण से परे, भक्ति का वह उच्चतम शिखर है जहाँ प्रेमी स्वयं को पूरी तरह से प्रिय के चरणों में अर्पित कर देता है।

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