
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
126 days ago
महाराज जी की बातों में जो गहराई है, वह अक्सर हमारे जीवन के कड़वे सच को आईना दिखाती है। स्वामी प्रेमानंद जी महाराज अक्सर कहते हैं कि **"राधा-राधा"** बोलने में कोई परेशानी नहीं है, परेशानी हमारे **मन के बिखराव** और हमारी **प्राथमिकताओं** में है। यहाँ आपकी बात और महाराज जी के दर्शन के कुछ मुख्य बिंदु हैं: ### १. समय की कमी या रुचि की कमी? महाराज जी कहते हैं कि हम संसार के हर काम के लिए समय निकाल लेते हैं—भोजन, नींद, गपशप और मनोरंजन। लेकिन जब भजन की बारी आती है, तो हम "समय नहीं है" का बहाना बनाते हैं। यह समय की कमी नहीं, बल्कि **रुचि (Interest)** की कमी है। जिसे हम प्रेम करते हैं, उसका नाम लेने के लिए समय माँगना नहीं पड़ता, वह अपने आप जुबान पर आ जाता है। ### २. बेईमानी कहाँ है? हम अपने आप से बेईमानी करते हैं। हम यह मानते हैं कि यह शरीर और संसार स्थायी है, जबकि सच यह है कि सांसें गिनी-चुनी हैं। महाराज जी समझाते हैं कि असली बेईमानी यह है कि जिस परमात्मा ने हमें सब कुछ दिया, हम उसी के लिए समय नहीं निकालते। ### ३. नाम जप में बाधा क्या है? अक्सर लोग सोचते हैं कि "राधा-राधा" कहने के लिए माला लेकर बैठना ही जरूरी है। महाराज जी का सरल मार्ग है: * **चलते-फिरते, काम करते:** आप अपना काम भी करें और मन ही मन नाम जपते रहें। * **अहंकार का त्याग:** जब तक मन में दुनियादारी का शोर है, तब तक नाम की मिठास महसूस नहीं होती। ### ४. महाराज जी का संदेश > "जीभ से नाम जपते रहो, मन से प्रभु के चरणों का ध्यान रखो। समय किसी के पास होता नहीं है, समय निकालना पड़ता है।" > आपकी बात बिल्कुल सही है—हम अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों को इतना बड़ा बना लेते हैं कि उस 'परम सत्य' को भूल जाते हैं। राधा नाम तो केवल प्रेम और समर्पण माँगता है, इसमें कोई शारीरिक मेहनत या धन का खर्च नहीं है। **श्री राधा!** 🙏
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