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*एक व्यक्ति जीवन के दुखों से तंग आकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करने लगा। वर्षों तक उसने मूर्ति की पूजा-अर्चना की, लेकिन परिस्थितियाँ न बदलने पर वह निराश हो गया। एक मित्र की सलाह पर उसने माँ काली की सेवा शुरू कर दी और श्रीकृष्ण की मूर्ति को मंदिर से हटाकर ऊपर एक छज्जे (टांड़) पर रख दिया।* *एक दिन जब वह माँ काली के सामने सुगंधित अगरबत्ती जला रहा था, तो उसे विचार आया कि कहीं इसकी खुशबू ऊपर रखे श्रीकृष्ण तक न पहुँच जाए, जिन्हें उसने पूजना छोड़ दिया था। इसी 'अधिकार भाव' के कारण वह स्टूल पर चढ़कर श्रीकृष्ण की मूर्ति की नाक पर पट्टी बाँधने लगा। जैसे ही उसने मूर्ति को छुआ, भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए और उसका हाथ पकड़ लिया।* *हैरान भक्त ने जब इसका कारण पूछा, तो प्रभु ने मुस्कुराकर कहा— "आज तक तू मुझे पत्थर की निर्जीव मूर्ति मानकर पूजता था, इसलिए मैं नहीं आया। लेकिन आज जब तूने मेरी नाक बंद करने की कोशिश की, तो तेरे मन में यह दृढ़ विश्वास जागा कि यह मूर्ति भी सूंघ सकती है और इसमें प्राण हैं। तेरे इसी 'जीवित भाव' और विश्वास ने मुझे प्रकट होने पर विवश कर दिया।"* *सीख: ईश्वर केवल कर्मकांड या सजावट की मूर्तियों में नहीं, बल्कि भक्त के उस सच्चे विश्वास में बसते हैं जहाँ भक्त उन्हें अपने समान जीवित और अनुभवशील मानता है।*

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