
Rama Devi Sahu
84 days ago
*भगवान् की लीलाएँ अनन्त हैं* भगवान के जो प्रेमीभक्त हैं या अवतार लिये हुए हैं, वे सब नियम-कानून मानते हैं; पर उनका यहाँ का कानून मानना वैसे ही है, जैसे राजपरिवार सैर करने निकले और मन्त्री के प्रबन्ध में उसे रहना पड़े। मन्त्री ने जहाँ जैसे रहने की, खाने की व्यवस्था की है, उसी व्यवस्था का राजपरिवार के सदस्य पालन करते है। पर यह सब करते हुए भी जैसे वे अपने को इनके शासन से सर्वथा परे समझते है, वैसे ही ऐसे जो कोई बिरले भाग्यवान् संत होते हैं अथवा अवतार लिये होते हैं, वे यहाँ इस संसार के कानून का ठीक-ठीक पालन तो करते हैं, पर वस्तुतः वे अपने को इस राज्य के शासकों की शासन व्यवस्था से परे अनुभव करते हैं। कल्पना कीजिये- सम्राट् को मजाक सूझे और इसकी इच्छा से कोई महल की रानी वेष बदलकर राज्य में घूमे। अब कोई राजा का चपरासी हो, उस बेचारे को तो पता है नहीं कि यह महल की रानी है, वेष बदले हुए है। अब सम्राट् का रानी के लिये संकेत है कि ‘तुमको वेष बदलकर जब दरबार में हम रहें, तब आना होगा।’ अब जब वह रानी जायगी, तब चपरासी तो उसके साथ भी वही व्यवहार करेगा, जो वह सबके साथ करता है। ठीक उसी तरह पहले आदेश लायेगा, तब दरबार में प्रवेश करने देगा। वहाँ दरबार में भी केवल सम्राट् को ही पता है कि यह तो हमारी रानी है, वेष बदले हुए यहाँ आयी है; और लोग तो जानते भी नहीं कि यह कौन है? रानी वहाँ दरबार में खूब ठाट से, ढंग से बात करती है; पर मन-ही-मन वह भी हँसती है तथा सम्राट् भी उस पर हुकुम तो चलाते हैं, पर मन-ही-मन खूब हँसते हैं। इसी प्रकार भगवान् व उनके उच्चकोटि के प्रेमीभक्त भी कभी-कभी लीला किया करते हैं। एक बहुत सुन्दर लीला आती है- भगवान् द्वारका में गद्दी पर बैठे हैं तथा कुछ ग्वालिनें दही के मटके लिये दरबार में आती हैं। भगवान् तो सब जानते हैं- पहले अदब से बात होती है। फिर गोपियाँ कहती हैं कि ‘चलो वृन्दावन में, यहाँ गद्दी से उतरो।’ सारा दरबार ठक् हो जाता है कि भला, ये गँवारी ग्वालिनें कितनी बढ़-बढ़कर बातें कर रही हैं! श्रीकृष्ण थोड़ा और भी रंग जमाते हैं। गोपियाँ कहती हैं कि ‘हम राधारानी की दासियाँ हैं; यदि सीधे मन से नहीं चलोगे तो फिर दस्तावेज निकालना पड़ेगा!’ (श्रीकृष्ण ने प्रेम विवश होकर एक दस्तावेज लिख दिया था कि मैं आजीवन राधारानी की सेवा में रहूँगा।) श्रीकृष्ण खूब हुज्जत करते हैं कि हमें याद नहीं कि हमने कहाँ क्या दस्तावेज लिखा है। फिर गोपियाँ दस्तावेज निकालकर श्रीकृष्ण को दिखलाती हैं और गद्दी से उतार देती हैं। सारा दरबार चकित रह जाता है। श्रीकृष्ण पीछे-पीछे चल पड़ते हैं। अब सोचिये, _वृन्दावन के महल की दासी उनकी इच्छा से ही दरबार में आती है तथा तरह-तरह की लीला करती है, पर लीला देखकर यह अनुमान भी नहीं हो सकता कि ये ही राजराजेश्वर श्रीकृष्ण वृन्दावन की गोपियों के दास हैं। ये अप्रकट लीलाएँ प्रेमी भक्त संतों के नेत्र गोचर होती हैं, ग्रन्थों में पूरी नहीं पायी जातीं।_ और *ये लीलाएँ कुछ इतनी ऊँची हैं कि मन जब तक बिलकुल पवित्र नहीं हो जाता, तब तक इनके रहस्य का अनुमान लगाना भी बड़ा ही कठिन होता है। किसी भी दृष्टान्त से इसके वास्तविक रहस्य को समझा नहीं जा सकता।* भगवान् की लीलाएँ अनन्त हैं। उनमें किसी में भी मन लग जाने पर तो महीने-के-महीने बीत जाते हैं, एक ही ध्यान बँधा रह जाता है। पता ही नहीं लगता कि क्या हो रहा है। समाधि हो जाती है। परंतु जब तक ऐसी अवस्था नहीं हो जाती, तब तक चंचल मन को वश में करने के लिये अपने पसंद की दस-बारह लीलाएँ चुन लेनी चाहिये तथा खूब कड़ाई से समय बाँध लेना चाहिये कि इतने समय से लेकर इतने समय तक यह लीला, फिर यह लीला, फिर यह। इस प्रकार जागने से सोने तक मन- ही- मन चिन्तन का तार चलता रहे। बाहर से तो सुन रहे हैं, पोथी पढ़ रहे हैं, किसी से बात कर रहे हैं अथवा बैठकर नाम-जप कर रहे हैं, पर भीतर का काम भी चलते ही रहना चाहिये। खूब चेष्टा करने से भगवान् की कृपा होने पर ऐसा बड़ी आसानी से हो सकता है..!! *🙏🏻🙏🏼🙏🏿जय जय श्री राधे 🙏🏽🙏🏾🙏* RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI🙏🌹
Comments (4)

Rama Devi Sahu
Jun 7, 2026
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

Riya Riya 💖💖
Jun 7, 2026
राधे राधे जी 🌹🌹🌿🌹🙏जय श्री कृष्ण जी 🌹🙏 ❤️शुभ दुपुर वंदन बहन जी 🙏💐

Rama Devi Sahu
Jun 7, 2026
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

