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चापलूस और मीठा बोलने से अच्छा स्पष्ट एवं कटु वक्त अच्छा है, क्योंकि मीठा बोलने वाला व्यक्ति ऊपर से अच्छा होता है और अंदर से जहर उगलता है, परंतु स्पष्ट वक्ता अथवा कटु बोलने वाला बाहर से अवश्य ही बुरा होता है परंतु हृदय से अच्छा सोचने वाला होता है अक्सर देखा गया है कि 'मीठी वाणी' यदि केवल स्वार्थ के लिए हो, तो वह एक सुंदर जाल की तरह होती है, जिसमें व्यक्ति अनजाने में फँस जाता है। इसके विपरीत, 'स्पष्टवादिता' (चाहे वह सुनने में कड़वी ही क्यों न हो) एक कड़वी औषधि की तरह होती है, जो उस समय तो बुरी लगती है पर अंततः सुधार और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने भी इसी भावना को व्यक्त किया है: > "निंदक नियरे राखिये, ऑंगन कुटी छवाय, > बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।" > अर्थात, जो हमारी कमियाँ स्पष्ट रूप से बताता है, वह वास्तव में हमारा सबसे बड़ा शुभचिंतक है। हृदय की शुद्धता ही संबंधों की असली नींव होनी चाहिए, न कि शब्दों की बनावटी मिठास। आपका भी आज का दिन अत्यंत सुखद, ऊर्जावान और मंगलमय हो! आपका दिन बहुत-बहुत मंगलकारी एवं शुभ हो सुप्रभात। 🙂🙏🏼🌹

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