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SHREE SHARMA

407 days ago

"विनाशकाले विपरीत बुद्धिः।" आयुर्वेद-शास्त्र के महान् ग्रन्थ ‘चरक’ को लिखनेवाले महर्षि पुनर्वसु अपने अद्वितीय ग्रन्थ को लिखने के पश्चात् एक जंगल में चले जा रहे थे। घने जंगल की पगडंडी पर आगे वे थे, पीछे उनका शिष्य अग्निवेश। एकाएक महर्षि पुनर्वसु खड़े हो गये। आगे की ओर देखा उन्होंने, चारां ओर देखा। एक लम्बी सांस लेकर बोले-‘‘महानाश आने वाला है।’’ अग्निवेश ने पूछा-‘‘कैसा महानाश, गुरुदेव?’’ पुनर्वसु बोले-‘‘मैं देखता हूं कि जल बिगड़ रहा है, पृथिवी बिगड़ रही है, वायु, तारे, आकाश, सूर्य और चन्द्र बिगड़ रहे हैं। अरे, अनाज अपनी शक्ति छोड़ देगा। औषधियां अपना प्रभाव छोड़ देंगी। पृथिवी पर टूटते हुए तारे गिरेंगे। विनाश करने वाली आंधियां चलेंगी। विनाशकारी भूकम्प उठेंगे। बड़े-बड़े बम गिरेंगे। महानाश का महाताण्डव जाग उठेगा। मनुष्य बचेगा नहीं, बचेगा नहीं।’’ यह कथा ‘चरक’ के विमान-स्थान के तीसरे अध्याय में आती है। इसमें लिखा है कि अग्निवेश ने जब यह भयानक भविष्यवाणी सुनी तो हाथ जोड़कर कहा-‘‘गुरुदेव! आप यह भयभीत करने वाली भविष्य-गाथा क्यों कर रहे हैं? सब रोग का सामना कर सकें, ऐसा ग्रन्थ आपने लिख दिया। दुनिया के प्रत्येक रोग का इलाज लिख दिया। फिर भी यह विनाश आयेगा तो क्यों? महर्षि पुनर्वसु ने कहा-‘‘इसलिये आयेगा कि लोग धर्म को छोड़कर अधर्म की ओर चल पड़ेंगे-सत्य को छोड़कर असत्यकी ओर। सत्य और धर्म में रुचि नहीं रहेगी।’’ अग्निवेश ने पूछा-‘‘धर्म और सत्य की ओर मनुष्य की रुचि न रहने का क्या कारण होगा, गुरुदेव?’’ गुरु बोले-‘‘ बुद्धि का बिगड़ जाना ही इस महानाश का कारण होगा। जब बुद्धि बिगड़ जाती है, जब वह सत्य का मार्ग छोड़कर असत्य की ओर बढ़ती है, तब धर्म में रुचि नहीं रहती।’’ बुद्धि का बिगड़ जाना ही सब रोगों का कारण है, परन्तु बुद्धि के बिगड़ जाने से केवल शारीरिक रोग पैदा नहीं होते, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और आत्मिक, सभी रोग पैदा होते हैं। इसीलिये कहते हैं कि जब नाश का समय निकट आता है, तब बुद्धि उलटे मार्ग पर चलने लगती है।भगवान् कृष्ण ने भी गीता में कहा है- बुद्धि नाशात्प्रणश्यति। बुद्धि का नाश होने से महानाश जाग उठता है। साभार : बोध कथाएं **************************************

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