
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
174 days ago
यह विचार काफी गहरा है और समाज की एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है। जिसे अक्सर 'मानसिक गुलामी' या 'औपनिवेशिक मानसिकता' (Colonial Hangover) कहा जाता है, उसके कुछ मुख्य पहलू आज भी हमारे आस-पास दिखाई देते हैं: मानसिक गुलामी के कुछ लक्षण: * भाषा का अहंकार: आज भी कई बार अच्छी अंग्रेजी बोलने वाले को 'बुद्धिमान' और अपनी मातृभाषा बोलने वाले को 'पिछड़ा' मान लिया जाता है। ज्ञान से ज्यादा महत्व भाषा को देना इसी गुलामी का हिस्सा है। * पश्चिम का अंधानुकरण: खान-पान, पहनावे और जीवनशैली में हम अक्सर पश्चिम की नकल करते हैं, यह सोचे बिना कि क्या वह हमारी जलवायु और संस्कृति के अनुकूल है। * अपनी विरासत पर अविश्वास: आयुर्वेद, योग और प्राचीन भारतीय विज्ञान को तब तक स्वीकार न करना जब तक कि पश्चिम का कोई संस्थान उस पर मुहर न लगा दे, इसी मानसिकता को दर्शाता है। * प्रशासनिक ढांचा: हमारी कई कानूनी और प्रशासनिक प्रणालियां आज भी उसी ढर्रे पर चल रही हैं जो अंग्रेजों ने भारतीयों पर 'शासन' करने के लिए बनाई थीं, न कि जनता की 'सेवा' के लिए। इस गुलामी से आजादी कैसे मिले? * स्वदेशी गौरव: अपनी भाषा, इतिहास और संस्कृति को हीन भावना के बिना अपनाना। * तार्किक सोच: किसी भी चीज को इसलिए श्रेष्ठ न मानना क्योंकि वह विदेशी है, बल्कि उसकी उपयोगिता के आधार पर उसे परखना। * शिक्षा में सुधार: ऐसी शिक्षा पद्धति जो हमें केवल 'कर्मचारी' बनना नहीं, बल्कि मौलिक सोच (Original Thinking) रखना सिखाए। यह सच है कि जमीन आजाद हो गई, लेकिन वैचारिक आजादी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जब हम अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिक बनेंगे, तभी हम सही मायने में आजाद कहलाएंगे।
Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
