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*श्री कृष्ण का 'सुदर्शन चक्र' युद्ध के बाद कहाँ गया? क्या वह आज भी धरती पर कहीं मौजूद है?* महाभारत के युद्ध में 'सुदर्शन चक्र' की धमक से बड़े-बड़े योद्धा कांपते थे। यह ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली अस्त्र माना जाता है, जिसे छोड़ने के बाद वह अपना लक्ष्य पूरा करके वापस लौट आता था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि भगवान श्री कृष्ण के बैकुंठ लौटने (देहत्याग) के बाद उनके इस दिव्य अस्त्र का क्या हुआ? ​आज 'सनातन दर्शन सीरीज' के 13वें दिन, हम इसी अनसुलझे रहस्य से पर्दा उठाएंगे। ​1. महाभारत के बाद की घटना पुराणों के अनुसार, जब द्वारका में यदुवंश का नाश हुआ और भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त करने का निर्णय लिया, तब उनके सभी दिव्य अस्त्र अपने मूल स्थानों पर लौटने लगे। ​2. सुदर्शन चक्र का अंतर्ध्यान होना (The Dissolution) श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत के मूसल पर्व में उल्लेख मिलता है कि जैसे ही श्री कृष्ण ने अपने भौतिक शरीर का त्याग किया, सुदर्शन चक्र, उनका धनुष (शार्ंग) और अन्य दिव्य अस्त्र समुद्र में समा गए या आकाश मार्ग से अपने मूल स्वरूप में विलीन हो गए। सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु की शक्ति का हिस्सा माना जाता है, इसलिए वह वापस उनकी ऊर्जा में समा गया। ​3. क्या वह आज भी धरती पर है? (The Prophecy) पौराणिक मान्यताओं और भविष्यवाणियों के अनुसार, सुदर्शन चक्र पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वह 'अदृश्य' अवस्था में है। ​कल्कि अवतार का इंतजार: कहा जाता है कि जब कलयुग के अंत में भगवान विष्णु का 'कल्कि अवतार' होगा, तब परशुराम जी और अश्वत्थामा उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। उसी समय सुदर्शन चक्र और अन्य दिव्य अस्त्र फिर से प्रकट होंगे ताकि अधर्म का नाश किया जा सके। ​4. एक दिलचस्प तथ्य: पुराणों के अनुसार, सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य की 'धूल' और शिव जी के तेज से किया था। इसमें 108 धारदार किनारे (Serrated edges) थे और यह मन की गति से चलता था। ​निष्कर्ष: सुदर्शन चक्र कोई साधारण हथियार नहीं, बल्कि 'चेतना' (Consciousness) का प्रतीक है। वह आज भी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में मौजूद है और सही समय (कल्कि अवतार) पर फिर से प्रकट होगा।

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Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Apr 4, 2026

जब सुदर्शन चक्र के भय से भागे दुर्वासा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ अम्बरीष बड़े धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में बड़ी सुख शांति थी। धन, वैभव,राज्य, सुख, अधिकार, लोभ, लालच से दूर निश्चिन्त होकर वह अपना अधिकतर समय ईश्वर भक्ति में लगाते थे। अपनी सारी सम्पदा, राज्य आदि सब कुछ वे भगवान विष्णु की समझते थे। उन्हीं के नाम पर वह सबकी देखभाल करते और स्वयं भगवान के भक्त रूप में सरल जीवन बिताते। दान-पुण्य, परोपकार करते हुए उन्हें ऐसा लगता जैसे वह सब कार्य स्वयं भगवान उनके हाथों से सम्पन्न करा रहे है। उन्हें लगता था कि ये भौतिक सुख-साधना, सामग्री सब एक दिन नष्ट हो जाएगी, पर भगवान की भक्ति, उन पर विश्वास, उन्हें इस लोक, परलोक तथा सर्वत्र उनके साथ रहेगी। अम्बरीष की ऐसी विरक्ति तथा भक्ति से प्रसन्न हो भगवान श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था। एक बार की बात है कि अम्बरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान व्रत रखने का नियम बनाया। हर द्वादशी को व्रत करते। ब्राह्मणों को भोजन कराते तथा दान करते। उसके पश्चात अन्न, जल ग्रहण कर व्रत का पारण करते। एक बार उन्होंने वर्ष की अंतिम द्वादशी को व्रत की समाप्ति पर भगवान विष्णु की पूजा की। महाभिषेक की विधि से सब प्रकार की सामग्री तथा सम्पत्ति से भगवान का अभिषेक किया तथा ब्राह्मणों, पुरोहितों को भोजन कराया, खूब दान दिया। ब्राह्मण-देवों की आज्ञा से जब व्रत की समाप्ति पर पारण करने बैठे ही थे तो अचानक महर्षि दुर्वासा आ पधारे। अम्बरीष ने खड़े होकर आदर से उन्हें बैठाया और भोजन करने के लिए प्रार्थना करने लगे। दुर्वासा ने कहा-“भूख तो बड़ी जोर की लगी है राजन ! पर थोड़ा रुको, मैं नदी में स्नान करके आ रहा हूँ, तब भोजन करूँगा।” ऐसा कहकर दुर्वासा वहा से चले गए। वहां स्नान-ध्यान में इतना डूबे कि उन्हें याद ही न रहा कि अम्बरीष बिना उनको भोजन कराएं अपना व्रत का पारण नहीं करेंगे। बहुत देर होने लगी। द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। द्वादशी के रहते पारण न करने से व्रत खण्डित होता और उधर दुर्वासा को खिलाएं बिना पारण किया नहीं जा सकता था। बड़ी विकट स्थिति थी। अम्बरीष दोनों स्थितियों से परेशान थे। अंत में ब्राह्मणों ने परामर्श दिया कि द्वादशी समाप्त होने में थोड़ा ही समय शेष है। पारण द्वादशी तिथि के अंदर ही होना चाहिए। दुर्वासा अभी नहीं आए। इसीलिए राजन ! आप केवल जल पीकर पारण कर लीजिये। जल पीने से भोजन कर लेने का कोई दोष नहीं लगेगा और द्वादशी समाप्त न होने से व्रत खण्डित भी नहीं होगा। शास्त्रो के विधान के अनुसार ब्राह्मणों की आज्ञा से उन्होंने व्रत का पारण कर लिया। अभी वह जल पी ही रहे थे कि दुर्वासा आ पहुंचे। दुर्वासा ने देखा कि मुझ ब्राह्मण को भोजन कराएं बिना अम्बरीष ने जल पीकर व्रत का पारण कर लिया। बस फिर क्या था, क्रोध में भरकर शाप देने के लिए हाथ उठाया ही था कि अम्बरीष ने विनयपूर्वक कहा-“ऋषिवर ! द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। आप तब तक आए नहीं। वर्ष भर का व्रत खण्डित न हो जाए, इसीलिए ब्राह्मणों ने केवल जल ग्रहण कर पारण की आज्ञा दी थी। जल के सिवा मैने कुछ भी ग्रहण नहीं किया है।” पर दुर्वासा क्रोधित हो जाने पर तो किसी की सुनते नहीं थे। अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर जमीन पर पटक कर कहा-“लो, मुझे भोजन कराए बिना पारण कर लेने का फल भुगतो। इस बाल से पैदा होने वाली कृत्या ! अम्बरीष को खा जा।”बाल के जमीन पर पड़ते ही एक भयंकर आवाज के साथ कृत्या राक्षसी प्रकट होकर अम्बरीष को खाने के लिए दौड़ी। भक्त पर निरपराध कष्ट आया देख उनकी रक्षा के लिए नियुक्त सुदर्शन चक्र सक्रिय हो उठा। चमक कर चक्राकार घूमते हुए कृत्या राक्षसी को मारा, फिर दुर्वासा की ओर बढ़ा। भगवान के सुदर्शन चक्र को अपनी ओर आते देख दुर्वासा घबराकर भागे, पर चक्र उनके पीछे लग गया। कहां शाप देकर अम्बरीष को मारने चले थे, कहां उनकी अपनी जान पर आ पड़ी। चक्र से बचने के लिए वे भागने लगे। जहां कही भी छिपने का प्रयास करते, वहीं चक्र उनका पीछा करता। भागते-भागते ब्रह्मलोक में ब्रह्मा के पास पहुंचे और चक्र से रक्षा करने के लिए गुहार लगाई। ब्रह्मा बोले-“दुर्वासा ! मैं तो सृष्टि को बनाने वाला हूं। किसी की मृत्यु से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। आप शिव के पास जाए, वे महाकाल है। वह शायद आपकी रक्षा करे।” दुर्वासा शिव के पास आए और अपनी विपदा सुनाई। दुर्वासा की दशा सुनकर शिव को हंसी आ गई। बोले-“दुर्वासा ! तुम सबको शाप ही देते फिरते हो। ऋषि होकर क्रोध करते हो। मैं इस चक्र से तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि यह विष्णु का चक्र है, इसलिए अच्छा हो कि तुम विष्णु के पास जाओ। वही चाहे तो अपने चक्र को वापस कर सकते है।” दुर्वासा की जान पर आ पड़ी थी। भागे-भागे भगवान विष्णु के पास पहुंचे। चक्र भी वहां चक्कर लगाता पहुंचा। दुर्वासा ने विष्णु से अपनी प्राण-रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु बोले-“दुर्वासा ! तुमने तप से अब तक जितनी भी शक्ति प्राप्त की, वह सब क्रोध तथा शाप देने में नष्ट करते रहे। तनिक सी बात पर नाराज होकर झट से शाप दे देते हो। तुम तपस्वी हो। तपस्वी का गुण-धर्म क्षमा करना होता है। तुम्हीं विचार करो, अम्बरीष का क्या अपराध था ? मैं तो अपने भक्तो के ह्रदय में रहता हूं। अम्बरीष के प्राण पर संकट आया तो मेरे चक्र ने उनकी रक्षा की। अब यह चक्र तो मेरे हाथ से निकल चुका है इसलिए जिसकी रक्षा के लिए यह तुम्हारे पीछे घूम रहा है, अब उसी की शरण में जाओ। केवल अम्बरीष ही इसे रोक सकते है।” दुर्वासा भागते-भागते थक गए। भगवान विष्णु ने दुर्वासा को स्वयं नहीं बचाया, बल्कि उपाय बताया। दुर्वासा उल्टे पाँव फिर भागे और आए अम्बरीष के पास। अम्बरीष अभी भी बिना अन्न ग्रहण किए, उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। दुर्वासा को देखते ही उनको प्रणाम कर बोले-“मुनिदेव ! मैं तब से आपकी प्रतीक्षा में बिना अन्न ग्रहण किए केवल वही जल पिया है, आप कहां चले गए थे ? दुर्वासा ने चक्र की ओर इशारा करके कहा-“अम्बरीष ! पहले इससे मेरी जान बचाओ। यह मेरे पीछे पड़ा है। तीनो लोको में मैं भागता फिरा, पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। अब तुम ही इस चक्र से मेरे प्राण बचाओ।” अम्बरीष हाथ जोड़कर बोले-“मुनिवर ! आप अपना क्रोध शांत करे और मुझे क्षमा करे। भगवान विष्णु का यह चक्र भी आपको क्षमा करेगा।” ।। जय श्री हरि ।। ~~~~~~~~~

Rama Devi Sahu

Rama Devi Sahu

Apr 4, 2026

🙏‼️ Om Shree Paramatmane Namah ‼️🙏