
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
2 days ago
भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नामों में से एक अनूठा नाम है **'रणछोड़'**। संसार में जहां युद्धभूमि से भागने वाले को कायर समझा जाता है, वहीं श्रीकृष्ण के इस कदम के पीछे गहन कूटनीति, प्रजा-रक्षा और एक प्राचीन वरदान का विधान छिपा था। **जरासंध का प्रतिशोध और कालयवन का आगमन** कंस के वध के बाद, उसका ससुर और मगध का शक्तिशाली राजा **जरासंध** अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने मथुरा पर एक के बाद एक 17 बार विशाल सेना लेकर आक्रमण किया। हर बार भगवान कृष्ण और बलराम ने उसकी सेना को परास्त किया, लेकिन जरासंध को जीवनदान दिया ताकि पृथ्वी के पापी योद्धा एक साथ मथुरा खिंचे चले आएं और उनका अंत हो सके। अठारहवीं बार जरासंध ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए **कालयवन** नाम के म्लेच्छ राजा से संधि कर ली। कालयवन को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि कोई भी चंद्रवंशी या सूर्यवंशी क्षत्रिय, देवता, दानव, गंधर्व या अस्त्र-शस्त्र उसे युद्ध में मार नहीं सकते। **रणभूमि छोड़ने की कूटनीति** कालयवन की तीन करोड़ सैनिकों की विशाल अक्षौहिणी सेना ने मथुरा को एक ओर से घेरा, जबकि दूसरी ओर से जरासंध ने आक्रमण की तैयारी की। श्रीकृष्ण ने स्थिति का तुरंत आकलन किया: * यदि वे दोनों ओर से युद्ध करते, तो मथुरा की निर्दोष प्रजा व्यर्थ में मारी जाती। * कालयवन को वरदान के कारण सीधे अस्त्र-शस्त्र से मारना संभव नहीं था। इसलिए श्रीकृष्ण ने निहत्थे होकर युद्धभूमि से दौड़ना शुरू कर दिया। कालयवन भी उनका उपहास उड़ाते हुए उनके पीछे भागा। इसी घटना के कारण संसार ने कान्हा का नाम **'रणछोड़'** रखा। **राजा मुचुकुंद और कालयवन का अंत** श्रीकृष्ण कालयवन को भगाते हुए बहुत दूर एक घने पर्वत की अंधेरी गुफा में ले गए। उस गुफा में त्रेतायुग के प्रतापी इक्ष्वाकु वंशी राजा **मुचुकुंद** सो रहे थे। राजा मुचुकुंद ने देवासुर संग्राम में देवताओं की लंबे समय तक रक्षा की थी। युद्ध समाप्ति पर देवताओं ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, तो अत्यंत थके मुचुकुंद ने बिना किसी विघ्न के चिरनिद्रा का वरदान मांगा। देवताओं ने यह भी वरदान दिया कि जो कोई उनकी नींद तोड़ेगा, वह मुचुकुंद की पहली दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जाएगा। श्रीकृष्ण गुफा में पहुंचे और अपना पीतांबर राजा मुचुकुंद के ऊपर ओढ़ाकर स्वयं एक शिला के पीछे छिप गए। कालयवन गुफा में पहुंचा और सोए हुए व्यक्ति को कृष्ण समझकर जोर से लात मार दी। जैसे ही मुचुकुंद की आंखें खुलीं और उनकी दृष्टि कालयवन पर पड़ी, उनके नेत्रों से निकली दिव्य क्रोधाग्नि में कालयवन पल भर में जलकर भस्म हो गया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपने यदुवंश और मथुरा की प्रजा को पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए समुद्र तट पर भव्य **द्वारिका नगरी** की स्थापना की। गुजरात के डाकोर में आज भी भगवान का प्रसिद्ध **'रणछोड़राय'** मंदिर स्थित है, जो इस बात का प्रतीक है कि परिस्थिति को भांपकर पीछे हटना भी कभी-कभी धर्म और लोक-कल्याण की सबसे बड़ी विजय सिद्ध होता है।
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