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द्वारका नगरी अपने वैभव, समृद्धि और ऐश्वर्य के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी। उसी द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अष्टमहिषियों सहित निवास करते थे। उनमें एक थीं पटरानी सत्यभामा, जो रूप, यौवन और अपार धन-वैभव से युक्त थीं। किंतु इन गुणों के साथ-साथ उनके मन में कहीं न कहीं अपने धन और अधिकार का सूक्ष्म अहंकार भी था। नारद मुनि का आगमन एक दिन देवर्षि नारद मुनि द्वारका पधारे। वे त्रिकालदर्शी थे और जानते थे कि भगवान की लीला से ही भक्तों का अहंकार टूटता है। उन्होंने देखा कि सत्यभामा अपने वैभव पर गर्व अनुभव कर रही हैं। नारद मुनि ने मुस्कुराते हुए कहा— “हे देवी! क्या आप जानती हैं कि इस संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु क्या है?” सत्यभामा ने गर्व से उत्तर दिया— “निश्चय ही धन, सोना और रत्न!” नारद मुनि मंद-मंद हँसे और बोले— “यदि ऐसा है, तो क्यों न आप भगवान श्रीकृष्ण को दान कर दें? फिर उन्हें उनके वजन के बराबर धन देकर पुनः प्राप्त कर लें।” भगवान श्रीकृष्ण ने भी लीला भाव से इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। तुलादान का आयोजन द्वारका में भव्य तुलादान की तैयारी हुई। एक विशाल तराजू लगाया गया। एक पलड़े में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हुए और दूसरे पलड़े में सत्यभामा ने अपने खजाने खोल दिए। सोने के ढेर, हीरे-मोती, मणियाँ, आभूषण—सब कुछ पलड़े में रख दिया गया। लेकिन आश्चर्य! भगवान का पलड़ा तनिक भी न हिला। सत्यभामा का चेहरा पीला पड़ गया। और अधिक सोना आया… और अधिक रत्न रखे गए… यहाँ तक कि पूरा खजाना खाली हो गया। परंतु श्रीकृष्ण का पलड़ा अब भी भारी था। अहंकार का टूटना, सत्यभामा की आँखों में आँसू आ गए। उनका गर्व चूर-चूर हो चुका था। उन्होंने पहली बार अनुभव किया कि उनका सारा वैभव भी प्रभु के सामने तुच्छ है। उसी समय शांत, सरल और करुणामयी माता रुक्मिणी आगे आईं। उन्होंने सत्यभामा से प्रेमपूर्वक कहा— “देवी, धन से नहीं… भक्ति से प्रयास कीजिए।” रुक्मिणी ने स्नान कर शुद्ध मन से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया और एक तुलसी का पत्ता लेकर उसे श्रद्धा-भाव से पलड़े में रख दिया। भक्ति की विजय जैसे ही तुलसी पत्र पलड़े में रखा गया— तराजू तुरंत बराबर हो गया। सभा स्तब्ध रह गई। नारद मुनि के मुख पर दिव्य मुस्कान थी। और श्रीकृष्ण की आँखों में अपार प्रेम। सत्यभामा भगवान के चरणों में गिर पड़ीं। उन्होंने रोते हुए कहा— “प्रभु, आज समझ में आया कि मैं धन की धनी थी, पर भक्ति की निर्धन।” भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उठाकर कहा— “जहाँ प्रेम और भक्ति होती है, वहीं मैं स्वयं बिक जाता हूँ।” इस कथा का आध्यात्मिक संदेश ईश्वर धन से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं अहंकार चाहे कितना भी बड़ा हो, भक्ति उसे क्षण में मिटा देती है तुलसी पत्र निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है सच्ची भक्ति में भगवान स्वयं बंध जाते हैं द्वारका का तुलादान मंदिर द्वारका में आज भी इस लीला से जुड़ा तुलादान मंदिर स्थित है। यहाँ श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु तुलादान करते हैं— पर यह स्मरण रखते हुए कि दान से अधिक भाव महत्वपूर्ण है।। 🌷 ऐसी ही नित्य भगवान की एवं संत गुरुजन कि अमृतमयी लीला वाणी पाने के लिए 📿 चैनल को *चैनल की घंटी(🔕)दबाएं ताकि पोस्ट का नोटिफिकेशन तुरंत मिले* _🌷🌷जय_जय_ _श्रीԶเधे_Զเधे🌷🌷_ _जय_श्रीकृष्ण_जी💐👏💖_ _जय श्रीराधेकृष्ण जी🌷🙏💕_ _🙏🌷जय जय श्रीराधेय्य्य्य राधेय्य्हैय्यय्य्य्य्य्🌷🙏_ _प्रणाम 🙏🙏_

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