
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
116 days ago
बैकुंठ धाम में एक दिन भगवान नारायण ने मुस्कुराते हुए लक्ष्मी जी से कहा, "देवी, देखो मृत्युलोक में मेरी भक्ति कितनी बढ़ गई है। चारों ओर 'नारायण-नारायण' की गूँज है।" लक्ष्मी जी मंद मुस्कुराईं और बोलीं, "प्रभु, यह भक्ति आपके लिए नहीं, बल्कि मेरे (धन) के लिए है। संसार आपको केवल इसलिए भजता है ताकि मैं उनके घर आ जाऊँ। यदि विश्वास न हो, तो चलिए एक परीक्षा लेते हैं।" भगवान विष्णु ने एक साधारण तेजस्वी ब्राह्मण का रूप धरा और पृथ्वी के एक समृद्ध नगर में पहुँचे। उन्होंने एक बड़े सेठ का द्वार खटखटाया। सेठ ने पूछा, "महाराज, यहाँ कैसे आना हुआ?" ब्राह्मण रूपी नारायण बोले, "मैं तुम्हारे नगर में प्रभु की कथा करना चाहता हूँ।" सेठ ने बड़े सम्मान से उन्हें अपने घर में स्थान दिया और भव्य कथा का आयोजन शुरू हुआ। उधर, लक्ष्मी जी ने एक अत्यंत निर्धन वृद्ध स्त्री का रूप लिया। वे उसी नगर की गलियों में घूमने लगीं। एक घर के सामने रुककर उन्होंने पानी माँगा। जैसे ही उस घर की महिला ने पानी पिलाकर लोटा वापस लिया, वह शुद्ध सोने का हो गया! यह खबर बिजली की तरह पूरे नगर में फैल गई। लोग कहने लगे, "एक ऐसी माता आई हैं, जिनके स्पर्श मात्र से लोहा और पीतल सोना बन जाता है।" बदलती श्रद्धा: अगले दिन नारायण की कथा में सन्नाटा छा गया। जो लोग 'नारायण-नारायण' जप रहे थे, वे सब उस बूढ़ी माई (लक्ष्मी जी) के पीछे भागने लगे। यहाँ तक कि वह मुख्य यजमान सेठ भी बेचैन हो गया। उसे लगा कि अगर यह बुढ़िया उसके घर आ जाए, तो उसका पूरा महल सोने का हो जाएगा। सेठ भागता हुआ लक्ष्मी जी के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला, "माता, आप मेरे घर चलिए।" लक्ष्मी जी ने शर्त रखी, "मैं तुम्हारे घर तब तक नहीं आ सकती, जब तक वह कथावाचक ब्राह्मण तुम्हारे घर में है। हम दोनों एक साथ एक ही घर में नहीं रह सकते।" धन के लोभ में अंधा होकर सेठ तुरंत घर पहुँचा और भगवान नारायण से बोला, "महाराज, क्षमा करें, अब आपके ठहरने की व्यवस्था धर्मशाला में कर दी गई है। आप कृपया अभी यहाँ से प्रस्थान करें।" भगवान नारायण चुपचाप मुस्कुराए और अपना कमंडल उठाकर बैकुंठ की ओर चल दिए। जैसे ही नारायण ने घर छोड़ा, लक्ष्मी जी भी वहाँ से जाने लगीं। सेठ घबराकर बोला, "माता, आप कहाँ जा रही हैं? मैंने तो आपकी शर्त मान ली!" लक्ष्मी जी ने गंभीर स्वर में कहा, "मूर्ख! मैं तो नारायण की दासी हूँ। मेरा स्वभाव है कि मैं वहीं रहती हूँ जहाँ मेरे स्वामी का वास होता है। जब तुमने स्वयं अपने हाथों से नारायण को घर से निकाल दिया, तो मैं यहाँ पल भर भी नहीं ठहर सकती।" इतना कहकर लक्ष्मी जी अंतर्ध्यान हो गईं और सेठ का महल पहले जैसा ही साधारण हो गया। अक्सर हम जीवन में सुख-संपत्ति (लक्ष्मी) के पीछे भागते हुए उस परमात्मा (नारायण) को भूल जाते हैं जिसने सब कुछ दिया है। सत्य तो यह है कि यदि हम नारायण को अपने हृदय में बसा लें, तो लक्ष्मी जी बिना मांगे ही हमारे पीछे चली आती हैं। "जहाँ नारायण, वहाँ लक्ष्मी।" प्रेम से बोलिए, जय श्री लक्ष्मी-नारायण! 🙏🌹

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