
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
206 days ago
5.2.2026 *"सब व्यक्ति सुखी होना चाहते हैं, दुखी होना कोई भी नहीं चाहता। सुख बढ़ाने के लिए और दुख से छूटने के लिए बहुत परिश्रम भी करते हैं, फिर भी दुख से छूट नहीं पाते, और सुख बढ़ता नहीं है।"* इसके बहुत सारे कारण हैं। उनमें से एक कारण है *"अपनी इच्छाओं को बढ़ाते जाना और दूसरे लोगों से आशाओं को बढ़ाते जाना."* जब आप अपनी इच्छाएं बढ़ाते जाते हैं, तो आप की सारी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती। जब आप की कुछ इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, तब आप को थोड़ा बहुत सुख मिलता है। *"परंतु जो इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती, वे आपको दुख देती रहती हैं। अब सारी इच्छाएं तो किसी भी व्यक्ति की पूरी हो नहीं पाती, और आपकी भी पूरी नहीं हो पातीं। इसलिए आप का दुख बढ़ता रहता है।"* *"और साथ ही साथ दूसरों से जितनी आशाएं आप रखते हैं, वे भी सारी पूरी नहीं हो पाती। आपकी जो आशाएं पूरी नहीं हो पाती, वे भी आपको दुख देती हैं।"* तो ये दोनों कारण हैं दुख को बढ़ाने वाले। *"यदि आप अपने दुख को कम करना चाहते हों, और सुख बढ़ाना चाहते हों, तो अपनी इच्छाओं को यथाशक्ति कम करें।" "मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि "सारी इच्छाएं छोड़ दें।" "यदि सारी इच्छाएं छोड़ दी, तो सुबह आप बिस्तर से उठेंगे भी नहीं। इसलिए ऐसा नहीं करना है।" "बल्कि जितना संभव हो, अपनी इच्छाओं को उतना कम रखें, तो आप दुखी कम होंगे और सुखी अधिक होंगे।"* *"ऐसे ही दूसरों से आशाएं भी कम ही रखें। जितनी कम आशाएं रखेंगे, उतने ही आप अधिक सुखी होंगे।"* आपको हिंदी भाषा का यह वाक्य अच्छी प्रकार से हर रोज रटना चाहिए। दिन में जितना अधिक हो सके, उतना अधिक दोहराना चाहिए। *"यदि मेरी इच्छाएं और आशाएं पूरी हो गई, तो ठीक है। और यदि पूरी नहीं हो पाई, तो कोई बात नहीं।"* *"इस वाक्य को यदि आप अच्छी प्रकार से समझ लेंगे, और इस पर जितना अधिक आचरण करेंगे, उतना ही आपका दुख कम होता जाएगा और आप का सुख बढ़ता जाएगा।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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