
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
140 days ago
✨ क्या ईश्वर की कृपा हमारे 'प्रारब्ध' (कर्मफल) को मिटा सकती है? 🚩 एक अत्यंत भावुक कर देने वाली सत्य कथा, जो हर सनातनी को अवश्य पढ़नी चाहिए! 👇 प्राचीन काल की बात है। एक सिद्ध गुरुजी थे, जिनका पूरा जीवन ईश्वर के नाम जप और भक्ति में बीता। वृद्धावस्था के कारण उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया था। उनके कुछ शिष्य पास ही के कमरे में रहा करते थे। जब भी गुरुजी को शौच या स्नान के लिए जाना होता, वे शिष्यों को आवाज़ लगाते और शिष्य उन्हें ले जाते। लेकिन समय के साथ शिष्यों की सेवा भावना कम होने लगी। अब वे गुरुजी की दो-तीन आवाज़ों के बाद भी देर से आते या कभी-कभी अनसुना कर देते। अचानक एक दिन चमत्कार हुआ... एक रात जैसे ही गुरुजी ने आवाज़ लगाई, तुरंत एक छोटा सा बालक आया। उसने बड़े ही कोमल स्पर्श के साथ गुरुजी को शौच-स्नान करवाया और वापस बिस्तर पर लिटा दिया। अब यह रोज़ का नियम बन गया। आवाज़ लगाते ही वह बालक दूसरे ही क्षण हाज़िर हो जाता! गुरुजी को आश्चर्य हुआ कि मेरे शिष्य तो इतनी देर से आते थे, यह बालक पलक झपकते ही कैसे आ जाता है? एक दिन गुरुजी ने उस बालक का हाथ पकड़ लिया और पूछा— "सच बता, तू कौन है? मेरे शिष्य तो ऐसे नहीं हैं।" तभी उस बालक ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया। वह और कोई नहीं, स्वयं परमपिता परमेश्वर थे! 🌺 अपने आराध्य को साक्षात सामने देखकर गुरुजी की आँखों से अश्रु बहने लगे। वे रोते हुए बोले— "हे प्रभु! आप स्वयं मेरे मल-मूत्र साफ कर रहे हैं? यदि आप मेरी भक्ति से इतने ही प्रसन्न हैं, तो मुझे इस जर्जर शरीर से मुक्ति ही दे दीजिए ना!" प्रभु का अत्यंत मार्मिक उत्तर: ईश्वर ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे मुनिवर! जो आप भुगत रहे हैं, वह आपका 'प्रारब्ध' (पिछले कर्मों का फल) है। आप मेरे सच्चे साधक हैं, हर समय मेरा नाम जपते हैं, इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथों से कटवा रहा हूँ।" गुरुजी ने शंका जताते हुए पूछा— "प्रभु! क्या मेरी साधना और आपकी कृपा मेरे प्रारब्ध से छोटी है? क्या आपकी कृपा मेरे इन दुखों को काट नहीं सकती?" कर्म का अटल नियम: प्रभु ने समझाया— "मेरी कृपा सर्वोपरि है! यह क्षण भर में आपके प्रारब्ध काट सकती है। लेकिन, कर्म का नियम अटल है। यदि मैंने अभी इसे काट दिया, तो इस बचे हुए प्रारब्ध को भुगतने के लिए आपको फिर से जन्म लेना पड़ेगा। मैं आपको इस जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्त करना चाहता हूँ, इसलिए स्वयं आपके साथ रहकर इसे कटवा रहा हूँ।" भगवान ने आगे बताया कि प्रारब्ध तीन प्रकार के होते हैं: 1️⃣ मन्द प्रारब्ध: जो केवल मेरा नाम जपने से कट जाते हैं। 2️⃣ तीव्र प्रारब्ध: जो किसी सच्चे संत की संगत और पूर्ण श्रद्धा से नाम जपने पर कटते हैं। 3️⃣ तीव्रतम प्रारब्ध: इन्हें हर हाल में भुगतना ही पड़ता है! लेकिन जो भक्त हर सांस में मुझे भजता है, उसके तीव्रतम प्रारब्ध के समय मैं स्वयं उसके साथ खड़ा रहता हूँ और उसे उस दुःख की तीव्रता का अहसास नहीं होने देता। 🙏 सार: ईश्वर कभी हमारे कर्मफल को बदलते नहीं, बल्कि उस दुःख को सहने की शक्ति बन जाते हैं। इसलिए हर परिस्थिति में ईश्वर का नाम जपते रहें। "प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्री रघुबीर॥" 🌸 जय श्री राम! जय श्री हरि! 🌸

Comments (1)

Radhe 🌹
Apr 12, 2026
Jai Shree Krishna 🙏 Radhe Radhe Ji 🙏🌷 Good Night
