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कान्हा की भक्ति और निश्छल प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए यहाँ एक छोटी और हृदयस्पर्शी कहानी प्रस्तुत है: ## **एक मुट्ठी चावल और प्रेम की पराकाष्ठा** वृंदावन की गलियों में एक वृद्धा रहती थी, जिसका नाम था सुदामा देवी। उसके पास न तो धन था और न ही कोई परिवार, बस एक छोटा सा मिट्टी का कान्हा था। वह उसे भगवान नहीं, बल्कि अपना 'लल्ला' मानती थी। ### **1. निश्छल सेवा** सुदामा देवी का पूरा दिन कान्हा की सेवा में बीतता। सुबह उसे जगाना, इमेजिनरी (काल्पनिक) माखन खिलाना और रात को लोरी सुनाकर सुलाना। लोग कहते, "माई, यह तो पत्थर की मूर्ति है, क्यों समय गँवाती है?" सुदामा देवी हँसकर कहती, **"तुम्हें पत्थर दिखता है, मुझे तो मेरा लल्ला अपनी शरारतों से थका देता है।"** ### **2. प्रेम की परीक्षा** एक बार सुदामा देवी बहुत बीमार पड़ गई। तीन दिन तक उसने कुछ नहीं खाया, इसलिए कान्हा को भोग भी नहीं लगा पाई। तीसरे दिन की शाम, उसे ग्लानि होने लगी कि उसका लल्ला भूखा होगा। वह रेंगते हुए रसोई तक गई, जहाँ केवल एक मुट्ठी सूखे और काले पड़ चुके चावल बचे थे। उसने कांपते हाथों से वे चावल कान्हा के सामने रखे और रोते हुए कहा, *"लल्ला, आज तेरी मैया हार गई। बस यही रूखा-सूखा है, ग्रहण कर ले।"* ### **3. भक्ति का चमत्कार** कहते हैं कि उस रात मंदिर के पुजारी ने एक सपना देखा कि कान्हा के अधरों (होठों) पर चावल का एक दाना चिपका है और वे मुस्कुरा रहे हैं। जब पुजारी सुदामा देवी की कुटिया में पहुँचा, तो उसने देखा कि वृद्धा शांत भाव से चिर-निद्रा में लीन थी, लेकिन कान्हा की उस मिट्टी की मूर्ति के चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पहले कभी नहीं देखी गई। > **सार:** कान्हा को छप्पन भोग की लालसा नहीं है, वे तो केवल उस भाव के भूखे हैं जिसमें कोई छल न हो। जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से सच्ची भक्ति का आरंभ होता है। > **राधे-राधे!** 🙏✨

Comments (4)

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

May 6, 2026

जय श्री राधे कृष्णा जी

Lal  Singh 🇮🇳🇮🇳

Lal Singh 🇮🇳🇮🇳

May 6, 2026

जय श्री राधे कृष्णा जी

Riya Riya  💖💖

Riya Riya 💖💖

May 5, 2026

Jai Shree Radhe Krishna Ji 🙏🙏 Shubh Ratri Vandan Bhaiya Jii 🙏🙏