
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
134 days ago
18.4.2026 व्यक्ति को दो प्रकार की उन्नति चाहिए, व्यक्तिगत भी और सामाजिक भी। *"दोनों का संतुलन करने से ही जीवन सुखमय बनता है।"* व्यक्तिगत उन्नति के लिए आप जो भी आसमान छूना चाहें, छू लें। अर्थात आप डॉक्टर बनें, पायलट बनें, वकील बनें, वैज्ञानिक बनें, वेद प्रचारक बनें, संन्यासी बनें, जो भी बनें, वह आपका व्यक्तिगत विषय है। *"मोटी भाषा में लोग इसे आसमान को छूना कहते हैं। छू लीजिए, कोई आपत्ति नहीं है।"* परंतु सामाजिक स्तर पर भी आपको कुछ सेवा करके अपनी सामाजिक उन्नति भी करनी चाहिए। *"यदि केवल व्यक्तिगत उन्नति करके, स्वार्थी बनकर खा पीकर सो गए, तो यह अधिक अच्छा नहीं है।"* अपनी स्वार्थ पूर्ति करने के साथ-साथ परोपकारी बनना भी आवश्यक है। क्योंकि आपकी व्यक्तिगत उन्नति में देश और समाज के करोड़ों व्यक्तियों ने आपको सहयोग दिया है। *"उन्होंने आपको भोजन वस्त्र मकान स्कूटर कार रेलगाड़ी हवाई जहाज सड़क बिजली पानी कंप्यूटर मोबाइल फोन इत्यादि की अनेक सुविधाएं प्रदान करके आपकी उन्नति में योगदान किया है। इसलिए आपका भी कर्तव्य है, कि आप भी देश और समाज की कुछ सेवा करें।"* समाज सेवा अनेक प्रकार की है। *"किसी को भोजन देना वस्त्र देना मकान देना रोगी की सेवा सहायता करना विद्वानों का सम्मान करना वेद प्रचार करना वेद प्रचार में दान देना इत्यादि।" "इनमें से सबसे उत्तम है, वेद प्रचार करना। यदि आप यह सेवा न कर पाएं, तो किसी योग्य आर्य विद्वान की सेवा करके उसके हृदय को छू लेना। यह भी बहुत अच्छा कार्य है। यदि आप ऐसा करेंगे, तो यह आपके जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। इससे आपका जीवन आनन्दमय बन जाएगा।"* *"अतः अपनी व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ कुछ परोपकार आदि सामाजिक सेवा भी अवश्य करें।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"*

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