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राधे-राधे! श्री प्रेमानंद महाराज जी अक्सर ऐसी कथाओं के माध्यम से हमें 'भगवद विधान' पर विश्वास करना सिखाते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारी दृष्टि सीमित है, लेकिन ईश्वर का आयोजन पूर्ण है। चलिए, इस कथा को इसके तार्किक और सुखद अंत तक ले चलते हैं: कहानी का अगला भाग जब राजा ने मंत्री को जेल में डाल दिया और मंत्री ने कहा "यह भी अच्छा हुआ," तो राजा को बहुत क्रोध आया। इसके बाद क्या हुआ, वह जानना बहुत जरूरी है: * जंगल में संकट: कुछ समय बाद राजा अकेले शिकार पर निकले और आदिवासियों के एक समूह ने उन्हें पकड़ लिया। वे अपने देवता को बलि देने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में थे। * बलि से मुक्ति: जब बलि देने का समय आया, तो उनके पुजारी ने देखा कि राजा का तो अंगूठा कटा हुआ है। शास्त्रों के अनुसार, खंडित शरीर की बलि नहीं दी जा सकती। इस कारण उन्होंने राजा को छोड़ दिया। * सत्य का बोध: राजा को तुरंत समझ आ गया कि अंगूठा कटना वास्तव में "अच्छा" था, क्योंकि उसी की वजह से आज उनके प्राण बच गए। जेल वाली बात "अच्छी" क्यों थी? राजा महल वापस आए और मंत्री को जेल से निकाला। उन्होंने पूछा, "मेरा अंगूठा कटा तो मेरी जान बची, यह तो अच्छा था। पर जब मैंने तुम्हें जेल भेजा, तो तुमने क्यों कहा कि यह भी अच्छा हुआ?" मंत्री ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया: > "महाराज, मैं आपका मंत्री हूँ और साये की तरह आपके साथ रहता हूँ। अगर आप मुझे जेल न भेजते, तो शिकारी मुझे भी आपके साथ पकड़ ले जाते। आपका अंगूठा कटा था इसलिए आप बच गए, लेकिन मैं तो 'पूर्ण' था, मेरी बलि निश्चित रूप से चढ़ जाती। इसलिए मेरा जेल जाना भी मेरे प्राण बचाने के लिए 'अच्छा' ही था।" > इस प्रसंग की सीख * पूर्ण विश्वास: जो हो रहा है, वह ईश्वर की मर्जी है। * धैर्य: विपत्ति के समय हमें भविष्य का मंगल दिखाई नहीं देता, लेकिन वह छिपा होता है। * सकारात्मकता: प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शांत रहना ही असली भक्ति है। "जो प्रभु करें, सो भला।"

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