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तमिलनाडु में मुनि (ऋषि) उनका नाम व्याघ्रपाद (Vyagrapada) है। "व्याघ्र" का अर्थ होता है 'बाघ' और "पाद" का अर्थ है 'पैर'। उन्हें 'बाघ के पैरों वाले मुनि' के रूप में जाना जाता है। उनकी कहानी बहुत ही रोचक और भक्ति से भरी है: व्याघ्रपाद मुनि की कथा ऋषि व्याघ्रपाद भगवान शिव के परम भक्त थे। वे चिदंबरम (जिसे उस समय 'तिरुतिल्लई' कहा जाता था) के जंगलों में भगवान शिव की आराधना करते थे। * कठिन चुनौती: उनका नियम था कि वे भगवान शिव को हर सुबह ताजे और अनछुए फूल अर्पित करेंगे। लेकिन समस्या यह थी कि सुबह होने के बाद मधुमक्खियां फूलों का रस चूस लेती थीं, जिससे फूल 'जूठे' हो जाते थे। * कांटों भरी राह: ताजे फूल चुनने के लिए उन्हें सूर्योदय से पहले अंधेरे में पेड़ों पर चढ़ना पड़ता था। पेड़ों के कांटे और जंगली झाड़ियाँ उनके पैरों को जख्मी कर देती थीं, और अंधेरे में फूलों की शुद्धता पहचानना मुश्किल होता था। * वरदान: उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। मुनि ने शिव जी से प्रार्थना की कि उन्हें बाघ के पैर और पंजे दे दिए जाएं, ताकि वे आसानी से पेड़ों पर चढ़ सकें और उनके पैरों में कांटे न चुभें। साथ ही, उन्होंने बाघ की तेज आंखें भी मांगी ताकि वे अंधेरे में भी श्रेष्ठ फूल देख सकें। * नटराज का नृत्य: शिव जी ने उनकी इच्छा पूरी की। व्याघ्रपाद मुनि और एक अन्य ऋषि पतंजलि (जो शेषनाग के अवतार माने जाते हैं) ने वर्षों तपस्या की ताकि वे भगवान शिव का 'आनंद तांडव' देख सकें। उनकी पुकार पर शिव जी ने चिदंबरम में अपना दिव्य नृत्य प्रस्तुत किया। आज कहाँ होती है उनकी पूजा? व्याघ्रपाद मुनि की उपस्थिति आज भी तमिलनाडु के मंदिरों में महसूस की जाती है: * चिदंबरम नटराज मंदिर: यहाँ उन्हें और ऋषि पतंजलि को भगवान नटराज के दोनों ओर खड़ा दिखाया जाता है। मंदिर की दीवारों और मूर्तियों में आप एक ऐसे मुनि को देख सकते हैं जिनका निचला शरीर बाघ का है। * पुलियुर (Puliyur): तमिलनाडु में कई ऐसी जगहें हैं जिनका नाम 'पुलियुर' (बाघ का शहर) है, जो इन्हीं मुनि से संबंधित हैं। * सिरकाली के पास व्याघ्रपुरी: यहाँ भी उनका एक विशेष स्थान है जहाँ उनकी पूजा की जाती है। उनकी पहचान * रूप: आधा शरीर मनुष्य का और कमर के नीचे का हिस्सा बाघ का। * साथी: अक्सर उनके साथ ऋषि पतंजलि (आधा शरीर सांप का) का चित्र या मूर्ति होती है।

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