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23.3.2026 जो लोग ईश्वर की उपासना/ साधना में प्रगति करना चाहते हैं, उन्हें यह पता होना चाहिए, कि कौन से कार्य साधना में सहायक होते हैं, और कौन से विरोधी। *"सहायक कार्यों का अनुष्ठान करना चाहिए और विरोधी कार्यों से बचना चाहिए, तभी उन्हें साधना में सफलता मिल सकती है।"* *"साधना में बाधक कार्यों में एक बहुत बड़ा बाधक कार्य है, आंख कान रसना आदि इंद्रियों द्वारा उनके रूप रस गंध आदि विषयों का सुख भोगना।" "जैसे सारा संसार इंद्रियों के विषयों का सुख भोग रहा है, ऐसा करना योगाभ्यास/साधना आदि में बहुत बाधक है।" "यह तो साधक में राग द्वेष को उत्पन्न करेगा, और उसकी साधना में बाधा ही डालेगा।" "इसलिए जीवन रक्षा के लिए भोजन वस्त्र मकान आदि वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए, रूप रस गंध आदि विषयों का सुख लेने के लिए नहीं।"* *"दूसरा एक बड़ा बाधक है, ईश्वर उपासना में लापरवाही करना, अर्थात कभी उपासना कर ली और कभी नहीं की। कभी याद रहा और कभी भूल गए। यह उपासना में अस्त-व्यस्तता या लापरवाही करना, आदि इस प्रकार के दोष करना उपासना/साधना की प्रगति में बाधक है।"* *"तो इन बाधकों का ज्ञान हर साधक को होना चाहिए, और इन बाधकों से बचकर विधिवत नियमित रूप से सावधानीपूर्वक ईश्वर उपासना/ साधना करनी चाहिए। इंद्रियों के विषयों = रूप रस गन्ध आदि से वैराग्य उत्पन्न करना चाहिए, और अपनी स्मरण शक्ति को भी चुस्त रखना चाहिए, तभी उपासना में सफलता मिलेगी, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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