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भारतीय पुराणों में अहल्या, द्रौपदी, कुंती, तारा और मंदोदरी को 'पंचकन्या' के रूप में संबोधित किया गया है। इन्हें केवल "पवित्र स्त्रियां" कहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इनके पीछे का रहस्य इनके असाधारण चरित्र और आत्मा की शुद्धता में छिपा है। प्रचलित श्लोक के अनुसार: > अहल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। > पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ॥ > यहाँ इन पांचों स्त्रियों के "कन्या" (Virgin/Pure) कहलाने के मुख्य आध्यात्मिक और दार्शनिक कारण दिए गए हैं: 1. अग्नि और जल जैसी शुद्धि शास्त्रों के अनुसार, 'कन्या' शब्द यहाँ शारीरिक कौमार्य से अधिक आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर सोना शुद्ध हो जाता है, इन पांचों स्त्रियों ने अपने जीवन के भीषण संघर्षों, अपमान और कठिन परिस्थितियों को अपनी इच्छाशक्ति से पार किया। इनका चरित्र उस कमल के समान माना गया है जो कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त और पवित्र रहता है। 2. चिर-कौमार्य का वरदान इनमें से कई पात्रों के पास विशेष आध्यात्मिक शक्तियां या वरदान थे: * अहल्या: ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित, जिनका अर्थ ही है "जिसमें कोई दोष न हो"। * कुंती: जिन्हें दुर्वासा ऋषि से ऐसा मंत्र प्राप्त था जिससे वे देवताओं का आह्वान कर सकती थीं और उनका कौमार्य अक्षुण्ण रहता था। * द्रौपदी: जिनका जन्म ही यज्ञ की अग्नि से हुआ था, इसलिए उन्हें 'अयोनिजा' (बिना गर्भ के जन्मी) कहा गया। 3. कठिन निर्णय और बुद्धिमत्ता ये पांचों स्त्रियां अपने समय की अत्यंत विदुषी और साहसी महिलाएं थीं। उन्होंने समाज के बंधनों से ऊपर उठकर धर्म की रक्षा के लिए कठिन निर्णय लिए: * मंदोदरी और तारा: इन्होंने अपने पतियों (रावण और बाली) को अधर्म के मार्ग पर चलने से रोकने का साहस किया। * द्रौपदी और कुंती: इन्होंने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया और एक पूरे युग के परिवर्तन की आधारशिला रखी। 4. मनोवैज्ञानिक पक्ष पुराणों का यह रहस्य हमें यह सिखाता है कि किसी स्त्री की पवित्रता केवल उसके शरीर या उसके साथ हुई घटनाओं (जैसे अहल्या के साथ छल) से नहीं मापी जा सकती। उसकी शुद्धि उसके संकल्प, त्याग और चारित्रिक दृढ़ता में निहित होती है। ये पांचों स्त्रियां हमें सिखाती हैं कि मनुष्य का अतीत चाहे कैसा भी रहा हो, यदि उसका वर्तमान और उद्देश्य लोक-कल्याणकारी है, तो वह वंदनीय है।

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