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26.6.2026 संसार की बिगड़ी हुई स्थिति को देखकर बहुत से लोग चिंता में डूबे रहते हैं, और बहुत परेशान होते रहते हैं, कि भविष्य कैसा होगा? वे चाहते हैं, कि *"संसार में न्याय हो, अन्याय न हो।" "जी हां, उनकी इच्छा सही है, सत्य है। मैं भी उनका समर्थक हूं।" "परंतु चिंता करने से क्या वे परिस्थितियों को बदल पाते हैं? जब नहीं बदल पाते, तो व्यर्थ की चिंता करने से तो उनकी हानि ही होगी। हो सकता है, ऐसे लोग पूरा सुधार न कर पाने के कारण, और चिताओं में डूबे रहने के कारण धीरे-धीरे डिप्रेशन में चले जाएं।"* मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि, *"संसार के सुधार के लिए पुरुषार्थ तो अवश्य करें, परंतु चिंता न करें।"* क्योंकि यह संसार सदा से ऐसा ही चल रहा है, और आगे भी ऐसा ही चलेगा। पूरी तरह से न कभी सुधरा, और न सुधरेगा। *"यदि संसार पूरी तरह से सुधर जाएगा, तो संसार में एक भी कुत्ता गधा शेर भेड़िया कीड़ा मकोड़ा वृक्ष वनस्पति आदि प्राणी नहीं मिलेगा। और इनके अभाव में मनुष्य भी कैसे जी पाएगा?"* मेरे कथन का अर्थ यह नहीं है, कि *"लोग घोटाला करें, और पशु पक्षी वृक्ष आदि बनें, ताकि मनुष्य का काम चलता रहे।"* मैं यह कहना चाहता हूं कि *"लोगों में कितने ही जन्मों की अविद्या भरी पड़ी है। वे अपनी अविद्या के कारण बुरे काम करते हैं, और आगे भी करेंगे। लोगों का स्तर ही ऐसा है, वे सुधरना ही नहीं चाहते।" "मुझे स्वयं भी 50 वर्ष हो गए सुधार का प्रयास करते हुए। परंतु परिणाम बहुत कम है। फिर भी मैं निराश नहीं हूं। आज भी मैं मनुष्यों का सुधार करने के लिए पूरी शक्ति से वर्ष में 365 दिन परिश्रम करता हूं, परंतु चिंता नहीं करता।" क्योंकि मैं ऐसा सोचता हूं कि "मैं इस संसार का मालिक नहीं हूं। मैं यहां का राजा नहीं हूं। इसको सुधारने की पूरी जिम्मेदारी मेरी नहीं है। मनुष्य शरीर धारी वर्तमान राजाओं की है, प्रजा की भी है, और सबसे बड़ी ईश्वर की जिम्मेदारी है।" "ईश्वर भी प्रतिदिन पुरुषार्थ करता है, कि लोग सुधर जाएं। बुरे काम न करें। वह रोज़ सबको मन में भय शंका लज्जा आदि उत्पन्न करके समझाता भी है, कि भाई! बुरे काम मत करो, अच्छे काम करो।" परंतु लोग ईश्वर की बात भी नहीं मानते। फिर भी अपराध करते हैं। "जब सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ सर्वव्यापक ईश्वर की बात भी संसार के लोग नहीं मानते, तो फिर आप की तो क्यों मानेंगे? आप ही क्यों सारी चिंताएं अपने सिर में लेकर बैठे हैं?"* *"इसलिए लोगों के सुधार का यथाशक्ति प्रयास तो आप अवश्य करें। परंतु चिंता न करें। जितना सुधार हो जाएगा, उतना ठीक है। आप अपना कर्तव्य पालन करेंगे, उसका आपको उत्तम फल ईश्वर देगा। बाकी संसार का राजा ईश्वर है। वही इसको चला रहा है, और आगे भी चला लेगा।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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