
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
1 day ago
कुल्लू दशहरे की परंपराओं में **माता भेखली (माता भुवनेश्वरी)** की कहानी बेहद रहस्यमयी, अनूठी और दिलचस्प है। माता भेखली से जुड़ी मुख्य बातें और पौराणिक कथा इस प्रकार हैं: ### **1. कौन हैं माता भेखली?** * **60 से अधिक गाँवों की अधिष्ठात्री:** माता भेखली (जिन्हें माता भुवनेश्वरी या जगन्नाथी भी कहा जाता है) कुल्लू की एक बेहद जाग्रत और प्रमुख देवी हैं। कुल्लू की भेखली पहाड़ी पर उनका भव्य मंदिर स्थित है। * **उड़ीसा से जुड़ा संबंध:** स्थानीय मान्यताओं और देववाणी के अनुसार, माता करीब 1400 साल पहले इस पहाड़ी पर प्रकट हुई थीं। चूँकि उनका संबंध उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी से माना जाता है, इसलिए उन्हें 'जगन्नाथी' के नाम से भी जाना जाता है। ### **2. जब राजा के सैनिक भी माता को नहीं ला पाए थे (रोचक कथा)** * **दशहरे में न जाने की जिद:** जब कुल्लू में राजा जगत सिंह के समय से दशहरा उत्सव की शुरुआत हुई, तो घाटी के सभी देवी-देवताओं को इस महाकुंभ में आमंत्रित किया गया। लेकिन माता भेखली ने दशहरा उत्सव में धालपुर मैदान जाने से मना कर दिया। * **जबरदस्ती का प्रयास और ओले बरसना:** राजा के आदेश पर कुछ सैनिकों को माता के रथ को जबरदस्ती धालपुर लाने के लिए भेजा गया। सैनिक माता के रथ को मंदिर से खींचकर करीब 100 मीटर दूर तक ले भी आए। * **दिव्य प्रकोप:** जैसे ही रथ को जबरन आगे बढ़ाया गया, अचानक सैनिकों पर आसमान से **लोहे के बड़े-बड़े ओले (पत्थर जैसे ओले)** बरसने लगे। इससे सैनिक बुरी तरह घायल हो गए और डरकर वहाँ से भाग खड़े हुए। बाद में राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने माता से क्षमा माँगी। ### **3. आज की परंपरा: रथ यात्रा और 'कटोरी' रूप में दर्शन** * **प्रतीकात्मक रस्म:** आज भी कुल्लू दशहरा शुरू होने के पहले दिन माता भेखली का रथ मंदिर से बस उसी ऐतिहासिक स्थान तक लाया जाता है, जहाँ तक पुराने समय में सैनिक उसे जबरदस्ती लाए थे। वहाँ पारंपरिक रस्म पूरी करने के बाद माता का रथ वापस अपने मंदिर (भंडार) लौट जाता है—माता खुद ढालपुर के मुख्य रथ मेले में शामिल नहीं होतीं। * **छठे दिन 'कटोरी' रूप में आगमन:** इस उत्सव के छठे दिन माता भेखली ढालपुर मैदान में एक विशेष **'कटोरी' के रूप में** दर्शन देती हैं। इस पवित्र कटोरी में विशेष तिलक रखा जाता है, जिससे भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार (राज परिवार के वंशज) का तिलक किया जाता है। इसके बाद इस कटोरी को भगवान रघुनाथ की गद्दी के पास रखा जाता है। कुल्लू दशहरे की यह परंपरा दर्शाती है कि यहाँ के स्थानीय देवी-देवताओं की अपनी स्वतंत्र महिमा, शक्ति और अनूठे नियम हैं, जिनका आज भी पूरी निष्ठा से पालन किया जाता है।

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