
SHREE SHARMA
266 days ago
#बोधकथा ➖ #एक_दृष्टान्त || मूर्तिमें भगवान् होनेकी दृढ़ भावना रखो || कई वर्ष पहलेकी बात है, एक सज्जन तीर्थयात्रा करते हुए अयोध्या पहुँचे। सब मन्दिरोंमें दर्शन आदि करके वे एक महात्माके पास गये । अवसर पाकर उन्होंने पूछा— 'महाराज ! भगवान्के दर्शन कैसे हों, कहाँ हों ?' ऐसा मालूम हुआ, मानो महात्माजी कुछ रुष्ट हो गये। उन्होंने कहा— 'कहाँसे आ रहे हो तुम ?' यात्रीने कहा— 'मन्दिरोंमें दर्शन करके ।' महात्माने कहा— 'मन्दिरोंमें केवल पत्थरके ही दर्शन करके आ रहे हो ? जिनकी सेवाके लिये हजार-हजार व्यक्तियोंके जीवन, धन और मन लग रहे हैं, जिनके लिये लोगोंने संसारका परित्याग कर रखा है, जो बहुतोंके जीवनसर्वस्व-प्राण हैं, उन्हें तुम केवल पत्थर समझते हो ? उनकी आँखसे देखो, तब तुम्हें मालूम होगा, वे मूर्तियाँ क्या हैं ? भैया ! वे साक्षात् भगवान् हैं— केवल भाव-दृष्टिसे नहीं, तत्त्व-दृष्टिसे भी। जब तत्त्व-दृष्टिसे सब भगवान् ही हैं, तब ये मूर्तियाँ भगवान् नहीं तो क्या हैं ? पहले शास्त्रों, सन्तों और भावनाओंके द्वारा एक स्थानपर भगवान्को प्रकट करना पड़ता है। एक स्थानमें, एक समयमें, एक वस्तुमें पहले भगवान्का दर्शन करो, उन्हें प्रकट करो, फिर तो सब स्थान, सब समय और सभी वस्तुएँ भगवत्स्वरूप ही होंगी। जो 'सब और सर्वत्र भगवान् हैं'— ऐसा कहते हैं, परंतु एक स्थानपर उन्हें प्रकट करके दर्शन नहीं कर लेते, वे कहीं भी दर्शन करनेमें सफल नहीं होते। इन मन्दिरस्थ भगवान्को पहचानो। इन अनबोले भगवान्से प्रीति करो। अनबोलतेसे प्रेम करनेमें ही तो प्रेमी हृदयकी पहचान है। फिर तो वे बोले बिना रहते नहीं। जब एक जगह बोल देते हैं, तो सर्वत्र बोलते हैं। तुम्हें ऐसा कभी नहीं सोचना चाहिये कि मुझे भगवान्के दर्शन कभी नहीं हुए। भगवान्के दर्शन हो रहे हैं। उन्हें जानकर, मानकर, अनुभव करके तुम्हें केवल मुग्ध होना चाहिये। भगवन्मूर्तिको पाषाण, गुरुको मनुष्य और प्रसादको भोग मानना अपराध है। तुम भगवान्को भगवान्के रूपमें देखो।' महात्माजीके उपदेशसे उन्हें बड़ा सन्तोष हुआ। वे अब सच्चे मूर्तिपूजक हैं। वे जिस मूर्तिकी पूजा करते हैं, वह साक्षात् भगवान्के रूपमें ही उनको दीखती है। 🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿🍂☘️🌿


