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**रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश जी महाराज** राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग के शीर्ष पर स्थित **त्रिनेत्र गणेश मंदिर** विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान श्रीगणेश अपने तीनों नेत्रों के साथ साक्षात विराजमान हैं। **पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि** * **भगवान राम और लंका विजय:** एक मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व इसी स्थान पर त्रिनेत्र गणेश की आराधना कर सेतु निर्माण और विजय की प्रार्थना की थी। * **राजा हम्मीर देव और स्वप्न दर्शन:** ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार 1299-1301 ईस्वी में जब अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर दुर्ग की घेराबंदी की, तब दुर्ग में अन्न-जल का भारी संकट उत्पन्न हो गया। राजा हम्मीर देव संकट में थे। मान्यता है कि भगवान गणेश ने राजा के स्वप्न में आकर दर्शन दिए और विजय का आशीर्वाद दिया। अगली सुबह दुर्ग के भंडार स्वतः भर गए और युद्ध में खिलजी सेना को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद राजा हम्मीर ने 1300 ईस्वी के आसपास दुर्ग के भीतर इस त्रिनेत्र स्वरूप की विधिवत प्रतिष्ठा करवाई। **त्रिनेत्र स्वरूप का रहस्य व दर्शन** * **तीसरा नेत्र:** भगवान शिव की तरह गणेश जी का तीसरा नेत्र **ज्ञान, विवेक और अंतर्दृष्टि** का प्रतीक है। यह जीवन के अज्ञान, अंधकार और संकटों को नष्ट करने की शक्ति को दर्शाता है। * **सम्पूर्ण परिवार की उपस्थिति:** इस मंदिर की प्रतिमा में गणेश जी अकेले नहीं हैं; वे अपनी दोनों पत्नियों—**रिद्धि** और **सिद्धि**, तथा दोनों पुत्रों—**शुभ** और **लाभ** के साथ विराजमान हैं। मूषक वाहन भी साथ स्थित है। **निमंत्रण पत्र (चिट्ठी) भेजने की अनोखी परंपरा** * भारतभर में किसी भी मांगलिक कार्य—विशेषकर विवाह, गृह प्रवेश या नए व्यापार के शुभारंभ—का पहला निमंत्रण पत्र रणथंभौर त्रिनेत्र गणेश जी के नाम भेजा जाता है। * डाकिए प्रतिदिन सैकड़ों-हजारों की संख्या में आने वाले शादी के कार्ड और चिट्ठियां मंदिर पहुंचाते हैं, जिन्हें पुजारी भगवान के चरणों में अर्पित कर श्रद्धालुओं की सुख-समृद्धि की मंगलकामना करते हैं। त्रिनेत्र गणेश जी को विघ्नहर्ता और संकटनाशक के रूप में पूजा जाता है, जिनके दर्शन मात्र से जीवन के समस्त विघ्न और संकट समाप्त हो जाते हैं।

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