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टैगोर कैसल (Tagore Castle) कोलकाता के सबसे अनोखे और ऐतिहासिक महलों में से एक है। १८२० में कोलकाता के पथुरियाघाटा में निर्मित यह इमारत अपनी खास बनावट के लिए जानी जाती है। यहाँ इसकी कुछ मुख्य विशेषताएं दी गई हैं: स्थापत्य कला (Architecture) यह हवेली पारंपरिक भारतीय हवेलियों से बहुत अलग दिखती है क्योंकि इसे यूरोपीय किलों (Castles) की शैली में बनाया गया था। * किलेनुमा बनावट: इसमें ऊंची मीनारें और 'बैटलमेंट्स' (किले की मुंडेर) हैं, जो इसे इंग्लैंड के विंडसर कैसल जैसा लुक देते हैं। * घंटाघर: बाद के समय में इसमें एक विशाल घड़ी वाला टावर भी जोड़ा गया था, जो उस समय के कोलकाता में एक बड़ी पहचान बन गया था। * लोहे का काम: इसके मुख्य प्रवेश द्वार और खिड़कियों पर बेहतरीन नक्काशीदार लोहे का काम देखने को मिलता है। ऐतिहासिक महत्व यह महल हरा कुमार टैगोर द्वारा बनवाया गया था और बाद में महाराजा जतींद्र मोहन टैगोर ने १८९० के दशक में इसका जीर्णोद्धार करवाकर इसे और भी भव्य रूप दिया। * सांस्कृतिक केंद्र: पथुरियाघाटा का टैगोर परिवार अपनी कला-प्रियता के लिए प्रसिद्ध था। इस महल में शास्त्रीय संगीत और रंगमंच की बड़ी सभाएं होती थीं। * विविधता: जहाँ रवींद्रनाथ टैगोर का 'जोड़ासाँको' परिवार साहित्य के लिए जाना जाता था, वहीं पथुरियाघाटा का यह परिवार ब्रिटिश प्रशासन और संगीत के संरक्षण में काफी प्रभावशाली था। वर्तमान स्थिति आज यह महल अपनी पुरानी भव्यता खो चुका है। इसका कुछ हिस्सा अब गोदामों और आवासीय फ्लैटों में बदल गया है, लेकिन इसकी बाहरी दीवारें और टावर आज भी १८वीं-१९वीं सदी की स्थापत्य कला की याद दिलाते हैं।

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