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*॥■○कूष्माण्डा माता○■॥* चतुर्थ दिवस नवरात्रि का यह, कुष्मांडा माँ अति पावन है। उद्भव है ब्रह्मांड का जिससे, मंद हँसी मन भावन है॥ चोतरफा था अंधकार ही, सृष्टि नहीं बन पायी थी। मंद हँसी फैलाकर माँ ने, सृष्टि नई रचायी थी॥ आदि शक्ति व आदि स्वरूपा, जग जननी कहलाती है। आठ भुजाओं वाली माता, 'अष्ट भुजा' कहलाती है॥ चक्र कमंडल धनुष बाण अरु, गदा हाथ में सोहत है। अमृत कलश अरु कर जपमाला, कमल पुष्प मन मोहत है॥ केहरि वाहन मात विराजे, कूष्माण्ड बलि प्यारी है। सूर्य लोक में रहने वाली, जग में महिमा न्यारी है॥ प्रभा सूर्य सम तेज कांति से, दशों दिशा आलोकित हैं। माँ की ज्योति तेज प्रभा ही, जग में सकल समाहित है॥ 'चेजारा' करो माँ की भक्ति, वय, बल,आरोग्य मिलेगा। कीर्ति लता चहूंदिशि बढ़ेगी, शक्ति व सौभाग्य मिलेगा॥

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