
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
4 days ago
1.9.2026 यूं तो दुखों के बहुत से कारण हैं। परंतु उनमें से दो बड़े-बड़े कारण ये हैं। *"एक -- अपने मन में बड़ी-बड़ी इच्छाएं Desires रखना। और दूसरा कारण है -- दूसरों से बड़ी-बड़ी आशाएं अर्थात Expectations रखना।"* इस संसार में ऐसा देखा जाता है, कि *"न तो किसी की सारी इच्छाएं पूरी होती, और न ही किसी की सारी आशाएं।"* आपकी जो इच्छाएं आप स्वयं पूरी कर सकते हों, उन्हें आप पूरा कर लीजिए। और जो आशाएं दूसरों के सहयोग से पूरी हो सकती हों, उन क्षेत्रों में दोनों विचार मन में रखें, कि *"आपकी वे आशाएं पूरी हो भी सकती हैं, और नहीं भी।"* क्योंकि यही सत्य है। *"यदि आप की वे आशाएं पूरी हो गई, तो ठीक है। और यदि पूरी नहीं हुई, तो अपने मन को शांत रखने के लिए अपने मन में कहें, "कोई बात नहीं।" "आज यह आशा पूरी नहीं हुई, तो फिर कभी प्रयास करेंगे।" "और 10 बार प्रयास करने पर भी यदि आपकी जो इच्छाएं और आशाएं पूरी नहीं हो पाती, तो उन्हें छोड़ देना ही बुद्धिमत्ता है।" "अन्यथा आप सदा दुखी होते रहेंगे।"* *"इसके अतिरिक्त अपनी इच्छाओं को पूरा करने में पूरा प्रयास करने पर भी, जितना आपको फल मिले, उतने में संतुष्ट रहना चाहिए।"* और ऐसा सोचना चाहिए कि *"मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि ईश्वर की कृपा तथा समाज के सहयोग से मुझे इतना फल तो मिला। इतना भी सबको नहीं मिल पाता।"* *"जो व्यक्ति ऐसा करता है, वही संसार में सबसे अधिक सुखी होता है। बाकी लोगों का सारा जीवन तो इन इच्छाओं और आशाओं के पीछे भागते भागते ही दुखमय हो जाता है।"* *"अतः बुद्धिमत्ता का प्रयोग करें। अपने मन में इच्छाएं कम रखें। दूसरे लोगों से आशाएं भी कम रखें। अपने जीवन में सदा पूर्ण पुरुषार्थ करते हुए जितना फल मिले, उतने में संतोष का पालन करें, तभी आप सुखी रह पाएंगे, अन्यथा नहीं।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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