
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
25 days ago
सृष्टि से पहले क्या था? जब कुछ भी नहीं था… तब कौन था? “जब न आकाश था, न धरती… न सूर्य था, न चन्द्रमा… न दिन था, न रात… न ब्रह्मा थे, न विष्णु… तब आखिर कौन था?” सनातन परंपरा इस प्रश्न का उत्तर केवल शब्दों में नहीं, बल्कि एक ऐसे रहस्य के रूप में देती है, जिसे जानकर मनुष्य का अहंकार मौन हो जाता है। लिंग पुराण के अनुसार—सृष्टि के आरंभ से पहले केवल एक ही परम तत्त्व विद्यमान था… वह था परम शिव। 🔱 न कोई संसार था, न कोई दिशा। न समय की गति थी, न जन्म और मृत्यु का चक्र। चारों ओर ऐसा मौन था, जिसकी कल्पना भी मनुष्य का मन नहीं कर सकता। उस अवस्था में न पृथ्वी थी, न जल, न अग्नि, न वायु और न आकाश। न सूर्य था, न चन्द्रमा, न ग्रह और न तारामंडल। यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र भी प्रकट नहीं हुए थे। केवल एक अनंत, अव्यक्त, निराकार और निर्गुण परम तत्त्व विद्यमान था— महादेव शिव। वे किसी सीमित शरीर में बंधे हुए देवता नहीं थे। वे उस परम चेतना के स्वरूप थे, जिससे आगे चलकर समस्त अस्तित्व प्रकट होना था। वे— अनादि थे, अनंत थे, निष्कल थे, निराकार थे और समस्त कारणों के भी परम कारण थे। लेकिन फिर प्रश्न उठता है—जब कुछ भी नहीं था, तो सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई? कहा जाता है कि सृष्टि का समय आने पर उस परम शान्त शिवतत्त्व में सृजन की दिव्य इच्छा प्रकट हुई— “एकोऽहं बहुस्यामिति।” अर्थात्— “मैं एक हूँ, अनेक रूपों में प्रकट होऊँ।” और यहीं से आरंभ हुई उस विराट लीला की कहानी, जिसे हम आज सृष्टि कहते हैं। प्रकट हुआ अनंत ज्योति-स्तम्भ सृष्टि के रहस्य को समझाने के लिए लिंग पुराण एक अत्यंत अद्भुत प्रसंग बताता है। अचानक एक ऐसी अनंत दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जिसका न कोई आदि दिखाई देता था और न कोई अंत। वह अग्नि का ऐसा विराट स्तम्भ था, जो अनंत आकाश को भेदता हुआ ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में चला गया। उसकी सीमा किसी को दिखाई नहीं दे रही थी। बाद में ब्रह्मा और विष्णु ने उस अनंत ज्योति का आदि और अंत खोजने का प्रयास किया। विष्णु भगवान वराह रूप धारण करके नीचे की ओर चले गए, ताकि उस ज्योति का मूल खोज सकें। और ब्रह्मा हंस रूप में ऊपर की ओर उड़ चले, ताकि उसके शिखर का पता लगा सकें। दोनों चले… बहुत दूर तक चले… लेकिन अनंत की सीमा भला कौन पा सकता था? विष्णु लौट आए और उन्होंने स्वीकार किया कि वे उसका अंत नहीं खोज सके। यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है— जिस परम सत्य से समस्त ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ है, उसे सीमित बुद्धि और इंद्रियों से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। फिर प्रकट हुए ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र जब सृष्टि की लीला आगे बढ़ी, तब उसी परम शिवतत्त्व से सृष्टि के विभिन्न कार्यों के लिए दिव्य शक्तियों का प्राकट्य हुआ। ब्रह्मा— सृष्टि के रचयिता बने। विष्णु— सृष्टि के पालनकर्ता बने। रुद्र— संहार और परिवर्तन के अधिष्ठाता बने। इस दृष्टि से त्रिदेव अलग-अलग परम सत्य नहीं, बल्कि एक ही परम तत्त्व की विभिन्न कार्यशक्तियों के रूप में समझे जाते हैं। फिर शिव से शक्ति का प्राकट्य हुआ। शिव और शक्ति के संयोग से प्रकृति की गति आरंभ हुई। महत्तत्त्व प्रकट हुआ। अहंकार प्रकट हुआ। तन्मात्राएँ प्रकट हुईं। पंचमहाभूत प्रकट हुए। और धीरे-धीरे— 🌍 पृथ्वी बनी। 💧 जल प्रकट हुआ। 🔥 अग्नि प्रकट हुई। 🌬️ वायु प्रकट हुई। आकाश का विस्तार हुआ। फिर देवता आए, जीव आए और अनगिनत लोकों से युक्त यह विराट ब्रह्मांड अस्तित्व में आया। जिस ब्रह्मांड में आज हम स्वयं को इतना बड़ा समझते हैं, वह भी उस अनंत सत्ता की विराट लीला का केवल एक अंश है। और जब सब कुछ समाप्त होगा? सृष्टि का रहस्य केवल उत्पत्ति तक सीमित नहीं है। जिस प्रकार सब कुछ शिवतत्त्व से प्रकट हुआ, उसी प्रकार प्रलय के समय यही सम्पूर्ण चराचर जगत पुनः उसी परम तत्त्व में लीन हो जाएगा। न पृथ्वी बचेगी। न सूर्य। न चन्द्रमा। न ग्रह। न शरीर। न नाम। न रूप। और अंत में फिर वही मौन होगा… वही अनंत शान्ति… वही निराकार परम तत्त्व… केवल शिव। फिर किसी अनंत काल में सृजन की इच्छा जागेगी और उसी मौन से पुनः एक नया ब्रह्मांड जन्म लेगा। इसीलिए सनातन दर्शन का संदेश अत्यंत गहरा है— “हम सृष्टि से अलग नहीं हैं… हम उसी परम चेतना की अभिव्यक्ति हैं, जिससे यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड प्रकट हुआ है।” सृष्टि शिव से निकली, शिव में ही स्थित है और अंततः शिव में ही विलीन हो जाती है। शिव ही आदि हैं… शिव ही अनंत हैं… और शिव ही परम सत्य हैं। हर हर महादेव! क्या आप मानते हैं कि सृष्टि का आदि और अंत केवल महादेव में ही है?

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