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*आपने कभी सोचा है शिव मौन क्यों रहते हैं?* *सती ने पूरे ब्रह्मांड में केवल शिव को ही क्यों चुना?* *"जिसे पाने के लिए तप किया जाता है, उसका प्रथम दर्शन आँखों से नहीं, हृदय से होता है।"* *सप्तर्षियों से सती की अटल भक्ति का समाचार सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हुए।* *शिवपुराण के अनुसार, उन्होंने सती के तप को स्वीकार किया और उन्हें वर देने का निश्चय किया। वन की नीरवता में उस दिन कुछ भिन्न था। वायु सुगंधित थी। पक्षियों का कलरव मानो स्वयं स्तुति बन गया था। सती ध्यान में लीन थीं।* *अचानक उनके चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैल गया। उन्होंने नेत्र खोले।* *सामने वही महायोगी खड़े थे, जिनका ध्यान वे वर्षों से कर रही थीं-* *त्रिनेत्रधारी, जटाजूटधारी, चन्द्रशेखर, व्याघ्रचर्मधारी, करुणा और तेज से आलोकित भगवान शिव।* *क्षणभर के लिए समय जैसे थम गया। सती के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली।* *वे शीघ्र उठीं और विनम्रतापूर्वक भगवान शिव को प्रणाम किया। महादेव ने करुणामयी दृष्टि से उन्हें देखा। और कहा-* *"देवि, तुम्हारे तप ने मुझे प्रसन्न किया है। वर माँगो।"* *सती ने कुछ क्षण मौन रहकर उत्तर दिया-* *"प्रभो... यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे अपना अर्धांग स्वीकार कीजिए।"* *भगवान शिव मुस्कुराए।* *उनके मुख पर वैराग्य था, पर उस वैराग्य में करुणा भी थी। उन्होंने कहा-* *"देवि, तुम्हारा प्रेम निष्काम है, तुम्हारा तप निष्कलुष है, और तुम्हारा संकल्प अटल है। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ।"* *सती ने पुनः उनके चरणों में प्रणाम किया।* *उस क्षण केवल एक तपस्विनी को उसका आराध्य ही नहीं मिला- शक्ति को अपना शिव मिल गया।* *सती ने धीरे से पूछा-* *"प्रभो... क्या आपने मुझे स्वीकार किया, या मेरे तप को?"* *शिव मुस्कुराए।* *"जिस तप में साधक स्वयं ही प्रेम बन जाए, वहाँ साधक और तप अलग नहीं रहते।"* *सती ने कहा- "क्या अब मेरा मार्ग समाप्त हो गया?"* *शिव बोले- "नहीं, सती। प्रेम की प्राप्ति अंत नहीं होती। वहीं से साथ चलने की यात्रा आरम्भ होती है।"* *सती ने पूछा- "क्या मैं कभी आपको पूर्णतः जान पाऊँगी?"* *शिव ने उत्तर दिया-* *"जो अनन्त है, उसे पूरा जाना नहीं जा सकता।"* *पर जितना प्रेम बढ़ेगा, उतना मैं प्रकट होता जाऊँगा।"* *गूढ़ रहस्य।"* *शिव का सती को वर देना केवल एक विवाह प्रस्ताव स्वीकार करना नहीं था। यह इस सत्य की घोषणा थी कि-* *जब साधना में अहंकार समाप्त हो जाता है, तब ईश्वर और साधक के बीच कोई दूरी नहीं रहती।* *शिव किसी बाहरी उपलब्धि से प्रसन्न नहीं हुए।* *वे सती के समर्पण से प्रसन्न हुए।* *शिव ने सती से पहले यह नहीं पूछा- "तुम्हारा कुल क्या है?" "तुम्हारी योग्यता क्या है?" "तुम्हारा रूप कैसा है?"* *उन्होंने केवल तप देखा और सती ने भी शिव से यह नहीं पूछा-* *"आप मुझे क्या देंगे?"* *उन्होंने केवल स्वयं को अर्पित कर दिया।* *शायद इसी कारण यह विवाह लेन-देन नहीं, दो पूर्णताओं का मिलन बन गया।* *"जहाँ समर्पण पूर्ण होता है, वहाँ ईश्वर 'वर' नहीं देते-स्वयं को दे देते हैं।"* *ब्रह्मा का प्रस्ताव और विवाह की तैयारी।* *"जब दो आत्माओं का मिलन केवल उनका निजी निर्णय न होकर सृष्टि के संतुलन का कारण बन जाए, तब उसे लीला कहते हैं।" भगवान शिव द्वारा सती को अर्धांगिनी रूप में स्वीकार करने के पश्चात् भी एक कार्य शेष था।* *विवाह।* *भगवान शिव स्वयं किसी औपचारिकता के इच्छुक नहीं थे। उनके लिए प्रेम ही पर्याप्त था।* *किन्तु धर्म की मर्यादा और लोकव्यवहार भी आवश्यक थे।* *शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ब्रह्मा के पास पहुँचे और कहा-* *"मैंने सती को स्वीकार किया है। अब उचित यही है कि उनके पिता दक्ष से विधिपूर्वक उनका वरण किया जाए।"* *ब्रह्मा प्रसन्न हुए।* *उन्होंने भगवान विष्णु तथा देवताओं को साथ लिया और दक्ष की सभा में पहुँचे। दक्ष ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया।* *ब्रह्मा ने कहा-* *"हे दक्ष! तुम्हारी पुत्री सती ने तप द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न किया है। स्वयं महादेव उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार कर चुके हैं। अब धर्मसम्मत रीति से उनका विवाह सम्पन्न होना चाहिए।"* *दक्ष कुछ क्षण मौन रहे। वे जानते थे कि शिव कोई साधारण देव नहीं हैं। पर उनके मन में एक प्रश्न अब भी था-* *"क्या मेरी राजकुमारी उस विरक्त योगी के साथ सुखी रह पाएगी?"* *फिर भी ब्रह्मा और विष्णु की उपस्थिति तथा देवताओं की सहमति देखकर उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।* *उन्होंने कहा- "यदि यही देवों की इच्छा और मेरी पुत्री का संकल्प है, तो मैं इस विवाह के लिए सहमत हूँ।"* *समस्त देवगण प्रसन्न हो उठे। विवाह की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गईं।* *उस रात्रि सती ध्

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