
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
101 days ago
🔥" भगवान शिव के अंशावतार गुरु गोरखनाथ" का जन्म कैसे हुआ? उन्हें भगवान शिव का प्रतिरूप और साक्षात अंशावतार माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका जन्म किसी माता के गर्भ से नहीं, बल्कि एक विशेष आध्यात्मिक घटना के फलस्वरूप हुआ था? वे गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) के प्रधान शिष्य थे और उन्हें 'अयोनिज' (जो गर्भ से पैदा न हुआ हो) माना जाता है। 1. गुरु मत्स्येंद्रनाथ का भिक्षाटन एक बार भगवान शिव के अवतार गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी भ्रमण करते हुए एक गांव में पहुँचे। वहां वे एक घर के द्वार पर भिक्षा मांगने रुके। उस घर की गृहिणी अत्यंत दुखी थी क्योंकि विवाह के कई वर्षों बाद भी उसकी कोई संतान नहीं थी। 2. वरदान स्वरूप विभूति (भस्म) उस महिला की सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी ने उसे अपनी झोली से अभिमंत्रित विभूति (राख/भस्म) दी और कहा— "माते! इस विभूति को शुद्ध जल के साथ ग्रहण कर लेना, महादेव की कृपा से तुझे एक अत्यंत प्रतापी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।" 3. महिला का संशय और भस्म का त्याग- मत्स्येंद्रनाथ जी के जाने के बाद उस महिला ने अपनी पड़ोसिनों को यह बात बताई। पड़ोसिनों ने उसे भ्रमित कर दिया कि कहीं यह कोई जादू-टोना न हो। संशय में आकर उस महिला ने वह विभूति खाने के बजाय घर के पीछे गोबर के ढेर (घूरे) में फेंक दी। 4. 12 वर्ष बाद गुरु का पुनरागमन ठीक 12 वर्ष बाद गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी फिर उसी गांव और उसी घर के सामने आए। उन्होंने महिला से पूछा— "माते! वह बालक कहाँ है जो मेरी दी हुई विभूति से उत्पन्न हुआ था?" महिला डर गई और उसने सारी सच्चाई बता दी कि उसने वह भस्म गोबर के ढेर में फेंक दी थी। 5. "जागो गोरख!" की दिव्य पुकार- गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी उस गोबर के ढेर के पास गए और उन्होंने आवाज लगाई— "अलख निरंजन! जागो गोरख!" गुरु की आवाज सुनते ही उस ढेर के अंदर से एक 12 वर्ष का अत्यंत तेजस्वी बालक बाहर निकल आया। वह बालक पूर्ण रूप से चैतन्य और योग मुद्रा में था। 6. नामकरण: गोरखनाथ चूंकि बालक का जन्म 'गो' (गाय के गोबर) की 'रख' (रक्षा/राख) से हुआ था, इसलिए गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी ने उनका नाम 'गोरखनाथ' रखा। वह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि भगवान शिव का ही अंश था जो योग की पुनर्स्थापना के लिए प्रकट हुआ था।

Comments (0)
No comments yet. Be the first to comment!
