
SHREE SHARMA
438 days ago
प्रभु श्री राम की घोषणा , ,,, निसिचर हीन करउं महि भुज उठाइ पन कीन्ह। अर्थ - श्री रघुवीर जी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं धरती को राक्षसों से रहित कर दूंगा। भगवान केवल घोषणा ही नहीं करते , बल्कि उसे कार्यान्वित भी करते हैं। भक्त तुलसीदास जी लिखते हैं - सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।। श्री राम ने समस्त मुनियों के आश्रमों में जा-जाकर उन सबको सुख दिया अर्थात् सभी आश्रमों में पहुंचकर विघ्न डालनेवाले राक्षसों का संहार किया। प्रभु श्री राम धरती को संपूर्ण राक्षसों से विहीन करना क्यों चाहते हैं ? अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया। घोर जंगल में हड्डियों का ढेर देखकर श्री रघुनाथ जी को बड़ी दया आ गई। उन्होंने मुनियों से पूछा। तब मुनियों ने कहा - निसिचर निकर सकल मुनि खाए। राक्षसों के दलों ने सभी मुनियों को खा डाला है। ( यह सब उन्हीं मुनियों की हड्डियों के ढेर हैं।) सुनि रघुबीर नयन जल छाए।। मुनियों के द्वारा यह सुनकर श्री रघुवीर के नेत्रों में जल भर आए अर्थात् उनकी आंखों में करुणा के आंसू आ गए। तपस्वी मुनियों को सताने वाले तथा उनकी हत्या करनेवाले राक्षसों का अंत करने के लिए ही प्रभु श्री राम ने उपर्युक्त प्रतिज्ञा की। महर्षि वाल्मीकिकृत रामायण में इस पर भगवती सीता और भगवान राम का सुंदर संवाद है। जानकी जी कहती हैं - क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम्। धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम्।। अपने मन और इंद्रियों को वश में रखनेवाले क्षत्रिय वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना ही प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें। श्री राम कहते हैं - क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति।। क्षत्रिय इसलिए धनुष धारण करते हैं कि कहीं आर्त्तनाद सुनाई न पड़े। जब कोई संकट या दुःख में पड़ता है , तभी वह संकट से बचने के लिए पुकार करता है। यदि कोई दुःख या संकट में पड़ा हो , तो उसकी रक्षा की जानी चाहिए। दंडकारण्य के तपस्वी मुनियों और ब्राह्मणों ने श्री राम से कहा - श्री राम ! यहां इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत से राक्षस रहते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवन निर्वाह करनेवाले ये भयानक राक्षस हमें मार कर खा जाते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुंच रहा है। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें। श्री राम जी जनकनंदिनी से कहते हैं - दंडकारण्य में ऋषियों की यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूप से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है। अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्। न तु प्रतिज्ञा संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषत:।। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूं , तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परत्याग कर सकता हूं , किंतु अपनी प्रतिज्ञा को विशेषतः ब्राह्मणों के लिए की गई प्रतिज्ञा को मैं कदापि नहीं तोड़ सकता। मिथिलेश कुमारी सीता जी से ऐसा वचन कहकर श्रीराम हाथ में धनुष लिए लक्ष्मण के साथ रमणीय तपोवन में विचरण करने लगे। ।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

Comments (2)

SHREE SHARMA
Jun 18, 2025
जय श्री राम कुशल मंगल है आप

Rama Devi Sahu
Jun 18, 2025
Jai Shree Ram 🙏 Jai Siya Ram 🙏🙏🌹
