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SHREE SHARMA

2 days ago

प्राचीन काल में राजा बहुकाश्यप नाम के एक परम प्रतापी और धर्मनिष्ठ नरेश हुए। वे प्रजापालक और न्यायप्रिय राजा थे, परंतु लंबे समय तक कोई संतान न होने के कारण अत्यंत दुःखी और चिंतित रहते थे। संतान प्राप्ति की तीव्र इच्छा से उन्होंने अनेक यज्ञ, जप और दान-पुण्य किए, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही थी। अंततः वे अपने वंश की रक्षा और योग्य पुत्र की प्राप्ति का मार्ग खोजने के लिए वन में महर्षि च्यवन के आश्रम पहुँचे। महर्षि च्यवन के आश्रम में राजा बहुकाश्यप ने एक अलौकिक दृश्य देखा। वहाँ एक अत्यंत तेजस्वी 'कपिला गाय' विद्यमान थी, जिसकी सेवा आश्रम के ऋषि-मुनि परम भक्तिभाव से कर रहे थे। राजा ने देखा कि उस कपिला गाय के प्रभाव से आश्रम का पूरा वातावरण शांत, पवित्र और सुखद बना हुआ था। हिंसा भाव भूलकर हिंसक पशु भी उस आश्रम में एक साथ शांति से निवास कर रहे थे। राजा ने चकित होकर महर्षि च्यवन से उस कपिला गाय की दिव्य महिमा और उसके प्रभाव के बारे में पूछा। महर्षि च्यवन ने राजा बहुकाश्यप को कपिला गाय का गूढ़ रहस्य बताते हुए कहा कि गौ माता साक्षात सर्वदेवमयी और भगवती आद्याशक्ति का ही प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। उनके शरीर में समस्त देवगण, तीर्थ और तीर्थक्षेत्र निवास करते हैं। महर्षि ने राजा को परामर्श दिया कि यदि वे संतानहीनता के कष्ट से मुक्त होना चाहते हैं, तो उन्हें निष्काम और परम श्रद्धा भाव से कपिला गाय की सेवा तथा जगदम्बा आद्याशक्ति की आराधना करनी चाहिए। महर्षि की आज्ञा शिरोधार्य कर राजा बहुकाश्यप ने आश्रम में रहकर कपिला गाय की अनन्य भाव से सेवा प्रारम्भ कर दी। वे स्वयं अपने हाथों से गाय को हरी घास चराते, उसके थकावट को दूर करने के लिए अंग-मर्दन करते और भक्तिपूर्वक उसका पूजन व परिक्रमा करते। राजा की इस निश्छल गौ-सेवा और भगवती की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर कपिला गाय के माध्यम से आद्याशक्ति जगदम्बा ने राजा पर विशेष अनुग्रह किया। देवी कृपा और गौ-माता के दिव्य आशीर्वाद के फलस्वरूप राजा बहुकाश्यप की महारानी ने एक अत्यंत तेजस्वी, गुणवान और धर्मनिष्ठ पुत्र को जन्म दिया। उस बालक ने आगे चलकर अपने कुल का नाम रोशन किया और राजा का राज्य सुखी व समृद्ध हुआ। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि भगवती आद्याशक्ति की कृपा प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति में गौ-सेवा का कितना महान एवं अलौकिक महत्त्व है।

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