
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
106 days ago
*कनकधारा स्तोत्र से संबंधित एक प्रचलित कथा है-* *जगद्गुरू आचार्य शंकराचार्य एक दिन भिक्षाटन के लिए निकले तथा घूमते-घूमते एक सद्गृहस्थ के द्वार पर जा पहुंचे । भिक्षां देहिʼ का उद्घोष किया । दुर्भाग्य से वह सद्गृहस्थ दरिद्र ब्राह्मण परिवार था । अपने द्वार पर एक अत्यन्त तेजस्वी संन्यासी अतिथि को देखकर ब्राह्मणी लाज में पड़ गई ।* *मन में संकल्प विकल्प होने लगा ।* *ऊहापोह में पड़ गई की घर में भिक्षा देने के लिए कुछ भी नहीं है, इन्हें क्या दूं ? ना देना मेरा धर्म नहीं और देने के लिए कुछ है नहीं । अपने दुर्दिनों पर रोना आ गया ।* *पुरे घर को छान मारा पर ऐसा कुछ न मिला जिसे वह भिक्षा में देती । आखिरकार एक सुखा आंवला मिला जिसे वह धो-पोंछ कर लाकर आचार्य को दी ।* *आंवले को देखते हीं आचार्य को उसकी दीनावस्था का आभास हो तरस आ गया, दया से मन भर गया, दिल की दया आँखो द्वारा झर पड़ी ।* *उन्होंने वहीं बैठकर तत्काल सामर्थ्य,* *ऐश्वर्य सुख की अधिष्ठात्री देवी,* *वात्सल्यमयी करूणानिधि, दीन हितैषिणी, माँ महालक्ष्मी की स्तुति प्रारम्भ कर दी ।* *आचार्य की वाणी से अनायास ही करूणापूर्ण ऐसी कोमलकान्त पद्मावली प्रस्फुटित हुई, जिसे सुनकर लक्ष्मी देखते ही देखते आचार्य के सम्मुख अपने त्रिभुवनमोहिनी रूप से प्रकट हो गई और अत्यन्त मधुर,* *कोमल वाणी में पुछा-- ʼमुझे क्यों स्मरण किया है वत्स!ʼ* * *आचार्य शंकर ने ब्राह्मण परिवार की व्यथा गाथा बताई और करबद्ध प्रार्थना की कि आप सागर हैं दया की, भक्तवत्सला हैं, उनका दारिद्र्य दूर करें । माता लक्ष्मी ने कहा-- 'इस गृहस्थ का ऐसा भाग्य, प्रारब्ध नहीं है, इसे इस जन्म में मेरी प्राप्ति नहीं हो सकती, वत्स ।ʼ* *आचार्य प्रवर ने भीगे कंठ से, भर्राये रुंधीत कंठ से कहा-- क्या इस आँगन में इस स्तोत्र पाठ के बाद भी यह संभव नहीं ? तब भगवती माँ लक्ष्मी ने बताया कि इसके घर में कनकधारा यंत्र रखकर पूजन कर स्तोत्र पाठ करो तो इसका दुर्भाग्य टल सकता है । आचार्य शंकर ने ऐसा हीं किया और उसी समय उस दरिद्र ब्राह्मण के आँगन में सोने के आंवलों की वर्षा हुई, जिसके फलस्वरूप उस गृहस्थ का दारिद्र्य दोष सदा के लिए मिट गया और वह प्रचुर धन-सम्पत्ति का स्वामी हो गया*

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