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प्राचीन काल की बात है, एक परम सिद्ध और आत्मज्ञानी संत समुद्र के किनारे मंद-मंद हवाओं का आनंद लेते हुए टहल रहे थे। वे अपनी विद्वत्ता और ज्ञान के लिए पूरे देश में विख्यात थे। वे अक्सर सोचते थे कि वे जगत के कण-कण का रहस्य और ईश्वर की असीमित माया को अपनी बुद्धि से समझ लेंगे। किनारे पर चलते-चलते उनकी दृष्टि एक छोटे से बालक पर पड़ी। वह बालक रेत पर बैठा हुआ बिलख-बिलख कर रो रहा था। संत का हृदय करुणा से भर गया। वे बालक के समीप गए और बड़े प्रेम से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "बेटा! इस सुंदर प्रभात में तुम इस तरह क्यों रो रहे हो? तुम्हें क्या कष्ट है?" बालक ने अपनी गीली आँखों से संत की ओर देखा और पास ही रखे एक छोटे से मिट्टी के प्याले की ओर इशारा करके बोला, "महात्मन! मैं बहुत परेशान हूँ। मैं इस विशाल समुद्र को इस छोटे से प्याले में भरना चाहता हूँ। मैं बार-बार प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन यह समुद्र मेरे प्याले में समाता ही नहीं।" यह सुनकर संत अचानक स्तब्ध रह गए। वे वहीं तट पर बैठ गए और उनकी आँखों से भी अश्रुओं की धारा बहने लगी। वे गहरी सोच (विस्माद) में डूब गए। बालक यह देखकर चकित रह गया। उसने संत से पूछा, "स्वामी जी! आप भी मेरी तरह रोने लगे? पर आपका प्याला कहाँ है? क्या आप भी मेरी तरह कुछ भरना चाहते हैं?" संत ने लंबी सांस ली और बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, "बेटा! आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। तुम तो केवल इस भौतिक समुद्र को एक छोटे से प्याले में भरने की कोशिश कर रहे हो, लेकिन मैं अपनी इस छोटी सी बुद्धि में उस अनंत परमात्मा और पूरे संसार के असीम ज्ञान को भरने की कोशिश कर रहा था। आज तुम्हें देखकर मुझे अहसास हुआ कि जब यह सागर प्याले में नहीं समा सकता, तो वह निराकार परमात्मा मेरी सीमित बुद्धि में कैसे समा सकता है?" संत की बात सुनकर बालक मुस्कुराया और उसने बिना देर किए उस प्याले को पूरी शक्ति से विशाल समुद्र की लहरों में फेंक दिया। प्याला पानी में डूबा और सागर का हिस्सा बन गया। बालक गर्व से बोला, "महाराज! अगर सागर मेरे प्याले में नहीं समा सकता, तो क्या हुआ? मेरा प्याला तो इस सागर में समा सकता है!" यह सुनते ही संत उस बालक के चरणों में गिर पड़े। उनकी विद्वत्ता का अहंकार चूर-चूर हो गया। वे गदगद होकर बोले, "बेटा! तुमने वह सत्य कह दिया जो बड़े-बड़े ज्ञानी और शास्त्र भी नहीं समझा पाते। वास्तव में, ज्ञान का अर्थ ईश्वर को अपनी बुद्धि में कैद करना नहीं, बल्कि स्वयं को उस ईश्वर में लीन कर देना है।" हे प्रभु! आपका ज्ञान का सरोवर मुझमें नहीं समा सकता, लेकिन मैं तो आपमें लीन होकर आपका अंश बन सकता हूँ।

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