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🌺 मन चंगा तो कठौती में गंगा: एक अलौकिक गाथा! 🌺 बनारस की तंग गलियों में एक छोटी सी कुटिया थी, जहाँ संत रविदास जी परम संतोष के साथ अपना जीवन व्यतीत करते थे। उनके लिए जूते बनाना मात्र एक आजीविका नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा का एक रूप था। एक दिन सुबह-सुबह, जब सूर्य की पहली किरणें गंगा के घाटों को सुनहरा कर रही थीं, एक ब्राह्मण देव हाथ में कमंडल लिए वहाँ से गुजरे। वे गंगा स्नान के महापर्व के लिए जा रहे थे। रविदास जी को अपने काम में तल्लीन देख वे रुके और बोले, "अरे रविदास! आज के दिन भी इस चमड़े और औजारों में उलझे हो? चलो, आज गंगा स्नान का बड़ा पुण्य है, अपने पाप धो लो।" रविदास जी ने सरलता से सिर उठाकर मुस्कुराते हुए कहा, "पंडित जी, पुण्य की इच्छा किसे नहीं होती? पर मैंने आज एक राहगीर को उसके जूते मरम्मत करके देने का वचन दिया है। यदि मैं अपनी प्यास बुझाने के लिए अपना कर्तव्य छोड़ दूँ, तो क्या गंगा मैया मुझे स्वीकार करेंगी? मेरे लिए तो मेरा 'कर्म ही धर्म' है।" जब पंडित जी जाने लगे, तो रविदास जी ने अपनी फटी हुई गुल्लक से एक सुपारी निकाली और विनम्रता से कहा, "पंडित जी, मेरी सामर्थ्य तो नहीं, पर यह तुच्छ भेंट माँ गंगा के चरणों में अर्पित कर दीजिएगा। बस एक विनती है—यह भेंट तभी दीजिएगा जब माँ स्वयं अपने हाथों से इसे स्वीकार करें।" पंडित जी मन ही मन हंसे, "कैसा मूर्ख है! मिट्टी और पानी की नदी हाथ कैसे फैलाएगी?" पर उन्होंने सुपारी रख ली। घाट पर पहुँचकर पंडित जी ने स्नान किया। चलते-चलते उन्होंने उपहास के भाव में पुकारा, "हे गंगे! तुम्हारे भक्त रविदास ने यह भेंट भेजी है, स्वीकार हो तो हाथ बढ़ाओ!" तभी एक विस्मयकारी घटना घटी। शांत जल में हलचल हुई और साक्षात् दो दिव्य हाथ लहरों से बाहर निकले। पंडित जी के हाथ से सुपारी लेकर, बदले में माँ गंगा ने एक रत्नजड़ित स्वर्ण कंगन उनके हाथ पर रख दिया और कहा, "यह मेरे प्रिय रविदास को दे देना।" कंगन की चमक देखकर पंडित जी का मन डोल गया। उन्होंने सोचा, "इस चमार को इस बहुमूल्य कंगन की क्या परख?" वे कंगन लेकर राजा के दरबार पहुँचे। राजा ने कंगन रानी को दिया, जो उसकी सुंदरता देख मंत्रमुग्ध हो गई। रानी ने तुरंत दूसरे हाथ के लिए भी वैसा ही कंगन माँगा। अब पंडित जी के प्राण संकट में थे। राजा ने चेतावनी दी, "दूसरा कंगन लाओ, वरना कारावास के लिए तैयार रहो!" थर-थर कांपते पंडित जी भागकर रविदास जी की कुटिया में गिरे और रोते हुए अपनी धूर्तता स्वीकार कर ली। रविदास जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने शांत भाव से कहा, "पंडित जी, ईश्वर हृदय में बसते हैं, आडंबर में नहीं।" उन्होंने अपनी 'कठौती' (लकड़ी का वह बर्तन जिसमें वे चमड़ा भिगोते थे) की ओर संकेत किया। उन्होंने माँ गंगा का स्मरण किया और जैसे ही उस मटमैले पानी में हाथ डाला, साक्षात् गंगा की धारा फूट पड़ी। उनके हाथ में ठीक वैसा ही दूसरा स्वर्ण कंगन चमक रहा था। पंडित जी यह देखकर स्तब्ध रह गए। उनके अहंकार का महल ढह गया। तब संत रविदास जी के मुख से यह कालजयी शब्द निकले: "मन चंगा तो कठौती में गंगा" यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि हमारा हृदय शुद्ध है और हम अपने काम को ईमानदारी से करते हैं, तो हमें ईश्वर को खोजने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ पवित्रता है, वहीं परमात्मा है।

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