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*🌹संध्या वंदन में पूजा, आरती, प्रार्थना या करें ध्यान?🌹* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 *⭕संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्‍याकाल- उक्त दो समय की संधि प्रमुख है •अर्थात- सूर्य उदय और अस्त के समय। वेदों के अनुसार इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।* *`•संध्या वंदन है सभी का कर्तव्य`* *`•हर हिन्दू के पांच नित्य कर्तव्य`* *🚩संध्योपासना के 5 प्रकार हैं-* (1) प्रार्थना, (2) ध्यान, (3) कीर्तन, (4) यज्ञ और (5) पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है। लेकिन इन पांचों में किसका ज्यादा महत्व है, यह भी जानना जरूरी है। बहुत से लोग पूजा को पाखंड मानते हैं, क्योंकि पूजा के अब मनमाने तरीके विकसित हो चले हैं। बहुत से लोग यज्ञ करने को भी पाखंड मानते हैं, क्योंकि यज्ञ भी अब मनमाने और कभी भी कहीं भी होने लगे हैं। बहुत से लोग अब कीर्तन में भी नहीं जाते, क्योंकि कीर्तन का स्वरूप बिगाड़कर फिल्मी कर दिया गया है। कीर्तन या भजन क्यों किया जाता था इसका महत्व भी समाप्त हो गया है। प्रार्थना और ध्यान अब मंदिरों में नहीं, बड़े आश्रमों में या योगा क्लास में होता है। *📿यज्ञ कब और क्यों...* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* *🚩वेदानुसार यज्ञ 5 प्रकार के होते हैं-* (1) ब्रह्मयज्ञ, (2) देवयज्ञ, (3) पितृयज्ञ, (4) वैश्वदेव यज्ञ, (5) अतिथि यज्ञ। उक्त 5 यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार को पकड़ते हैं, विस्तार को नहीं। *🚩(1) ब्रह्मयज्ञ:-* वेदों का अध्ययन करना और सिर्फ ब्रह्म (ईश्वर) को ही मानना-पूजना ब्रह्मयज्ञ है। *🚩(2) देवयज्ञ:-* सत्संग और अग्निहोत्र कर्म करना देवयज्ञ है। खुली जगह पर हवन करने को अग्निहोत्र कर्म कहते हैं। इस कर्म को करने का समय और नियम होता है। मूलत: यज्ञ को सभी संस्कारों के समय ही किया जाता है। यज्ञ के कुछ प्रकार हैं। *🚩(3) पितृयज्ञ:-* माता-पिता की सेवा करना ही पितृयज्ञ है। संतान उत्पन्न करने से भी पितृयज्ञ संपन्न होता है। इसी से *•'पितृ ऋण'* भी चुकता होता है। इसके अंतर्गत ही श्राद्ध कर्म किया जाता है। *🚩(4) वैश्वदेव यज्ञ:-* इसे पंचभूत यज्ञ भी कहते हैं। सभी प्राणियों तथा वृक्षों को अन्न-जल देना ही वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है *•अर्थात-* जो कुछ भी हम खाते हैं उसका कुछ अंश पहले उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। *🚩(5) अतिथि यज्ञ:-* अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। यह सबसे बड़ा पुण्य है। *📿जानिए पूजा कब और क्यों...* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* *🚩पूजा-आरती:-* पूजा को नित्यकर्म में शामिल किया गया है। पूजा करने के पुराणिकों ने अनेक मनमाने तरीके विकसित किए हैं। पूजा किसी देवता या देवी की मूर्ति के समक्ष की जाती है जिसमें गुड़ और घी की धूप दी जाती है, फिर हल्दी, कंकू, धूप, दीप और अगरबत्ती से पूजा करके उक्त देवता की आरती उतारी जाती है। पूजा में सभी देवों की स्तुति की जाती है। अत: पूजा-आरती के ‍भी नियम हैं। नियम से की गई पूजा के लाभ मिलते हैं। 12 बजे के पूर्व पूजा और आरती समाप्त हो जाना चाहिए। दिन के 12 से 4 बजे के बीच पूजा या आरती नहीं की जाती है। रात्रि के सभी कर्म वेदों द्वारा निषेध माने गए हैं, जो लोग रात्रि को पूजा या यज्ञ करते हैं उनके उद्देश्य अलग रहते हैं। पूजा और यज्ञ का सात्विक रूप ही मान्य है। *📿कैसे करें पूजन* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* पूजा से वातावरण शुद्ध होता है और आध्यात्मिक माहौल का निर्माण होता है जिसके चलते मन और मस्तिष्क को शांति मिलती है। पूजा संस्कृत मंत्रों के उच्चारण के साथ की जाती है। पूजा समाप्ति के बाद आरती की जाती है। यज्ञ करते वक्त यज्ञ की पूजा की जाती है और उसके अलग नियम होते हैं। पूजा करने से देवता लोग प्रसन्न होते हैं। पूजा से रोग और शोक मिटते हैं और व्यक्ति को मुक्ति मिलती है। *📿पूजा के 5 प्रकार :-* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* *🚩1- अभिगमन:-* देवालय अथवा मंदिर की सफाई करना, निर्माल्य (पूर्व में भगवान को अर्पित (चढ़ाई) की गई वस्तुएं हटाना)। ये सब कर्म *•'अभिगमन'* के अंतर्गत आते हैं। *🚩2- उपादान:-* गंध, पुष्प, तुलसी दल, दीपक, वस्त्र-आभूषण इत्यादि पूजा सामग्री का संग्रह करना 'उपादान' कहलाता है। *🚩3- योग:-* ईष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना 'योग' है। *🚩4- स्वाध्याय:-* मंत्रार्थ का अ

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