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*सप्तऋषि कौन थे? उन सात महर्षियों की कहानी, जिन्होंने वेदों के मंत्र देखे ?* *सोचिए, एक राजा अपनी पूरी अक्षौहिणी सेना लेकर एक आश्रम के द्वार पर पहुँचते हैं। आश्रम में न महल है, न रसोई, बस जंगल के फल-कंद हैं। राजा संकोच में कहते हैं, "मुनिवर, आपके स्वागत से ही मेरा सत्कार हो गया।" पर ऋषि बार-बार आग्रह करते हैं, "आप श्रेष्ठ अतिथि हैं, मुझे सेवा का अवसर दीजिए।"* *वे राजा थे राजा विश्वामित्र जी, और वे ऋषि थे महर्षि वशिष्ठ जी। इन्हीं दोनों का नाम उन सात महान ऋषियों में आता है जिन्हें हम सप्तऋषि कहते हैं। हमारी परंपरा इन्हें मंत्रद्रष्टा कहती है, यानी वे ऋषि जिन्होंने वेदों के मंत्र देखे।* *विष्णु पुराण (तृतीय अंश, अध्याय 1) के अनुसार वर्तमान मन्वंतर के सप्तऋषि हैं: महर्षि वशिष्ठ, महर्षि कश्यप, महर्षि अत्रि, महर्षि जमदग्नि, महर्षि गौतम, महर्षि विश्वामित्र और महर्षि भारद्वाज। आइए इन्हें जानें।* *महर्षि वशिष्ठ जी: जो अपने प्रतिद्वंद्वी को भी गले लगा सके वाल्मीकि रामायण में उन्हें "जप करने वालों में श्रेष्ठ" कहा गया है। वे राजा दशरथ जी के प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानकर्ता थे। उनकी सबसे बड़ी बात यह है: जिन विश्वामित्र जी ने हज़ारों वर्ष की तपस्या पूरी की, उनके पास देवताओं के कहने पर महर्षि वशिष्ठ स्वयं चलकर आए, मित्रता की और कहा, "आप ब्रह्मर्षि हैं।" ऋग्वेद का सातवाँ मंडल उन्हीं के कुल की देन है।* *महर्षि विश्वामित्र जी: राजा से ब्रह्मर्षि बने कल्पना कीजिए, एक राजा सब कुछ छोड़कर तप में बैठ गए। हज़ार वर्ष का मौन व्रत रखा। जिस दिन व्रत पूरा हुआ और उन्होंने भोजन आरंभ किया, उसी समय एक ब्राह्मण याचक आ गए। महर्षि विश्वामित्र ने बिना एक शब्द कहे अपना पूरा भोजन उन्हें दे दिया और स्वयं भूखे रहकर फिर तप में बैठ गए। रामायण कहती है कि इतने कष्टों में भी क्रोध ने उनके हृदय में प्रवेश नहीं किया। इन्हीं महर्षि ने हमें गायत्री मंत्र (ऋग्वेद 3.62.10) का दर्शन कराया।* *महर्षि अत्रि जी और माता अनसूया जी: जहाँ पूरा परिवार तपस्वी था वनवास में चित्रकूट छोड़कर जब भगवान श्रीराम महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे, तो महर्षि ने उनका स्वागत पुत्र की तरह किया। उनकी पत्नी माता अनसूया जी की तपस्या ऐसी थी कि जब दस वर्ष का अकाल पड़ा, तब उन्होंने फल-मूल उत्पन्न किए और माँ गंगा को प्रवाहित किया। माता अनसूया ने माता सीता जी को धर्म की सीख दी। ऋग्वेद का पाँचवाँ मंडल "अत्रि मंडल" कहलाता है, जिसमें 87 सूक्त हैं।* *महर्षि भारद्वाज जी: जिन्होंने रोगों से मुक्ति का ज्ञान जगत को दिया चरक संहिता में कथा है कि मनुष्य रोगों से इतना परेशान था कि साधना नहीं कर पा रहा था। तब महर्षि भारद्वाज देवराज इंद्र के पास गए और आयुर्वेद का ज्ञान लेकर धरती पर लाए। वही परंपरा उनके शिष्य महर्षि अग्निवेश से होती हुई आचार्य चरक की संहिता तक पहुँची। महाभारत में धनुर्वेद का श्रेय भी उन्हीं को दिया गया है। उनके पुत्र आचार्य द्रोण थे।* *और रामायण का वह दृश्य: सूरज ढल रहा था, प्रयाग के पास धुआँ उठता दिखा। भगवान श्रीराम ने श्री लक्ष्मण जी से कहा, "लगता है महर्षि भारद्वाज यहीं हैं।" महर्षि ने उन्हें अर्घ्य, जल और फल-कंद से सम्मान दिया और आगे का मार्ग बताया: चित्रकूट।* *महर्षि कश्यप जी: सृष्टि के आदि ऋषियों में एक बृहदारण्यक उपनिषद की वंश-सूची में उन्हें सबसे प्राचीन ऋषि कहा गया है। ऋग्वेद में उनके कुल के सूक्त मुख्यतः नौवें मंडल में हैं। विष्णु पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप लिया, तो वे महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र बने। महाभारत में पक्षीराज गरुड़ जी भी उनके पुत्र हैं। बच्चों और माताओं के आयुर्वेद पर "कश्यप संहिता" भी परंपरा से उन्हीं से जुड़ी है।* *महर्षि जमदग्नि जी: जिनकी तपस्या की ख्याति थी महाभारत कहती है कि वे वेदों के अध्ययन और कठोर तपस्या में इतने लीन रहते थे कि उनका नाम ही तप का पर्याय बन गया। उनके पुत्र भगवान परशुराम जी की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें वरदान दिए। ऋग्वेद के दशम मंडल का सूक्त 110 महर्षि जमदग्नि भार्गव के नाम से जाना जाता है।* *महर्षि गौतम जी: जिनके पुत्र ने भगवान श्रीराम को पहचान लिया रामायण में उन्हें "महात्मा" और "महातपस्वी" कहा गया है,* *जिनके तप का बल देवता और दानव भी नहीं तोड़ सकते थे। मिथिला की राजसभा में उनके ज्येष्ठ पुत्र महर्षि शतानंद जी ने भगवान श्रीराम को देखते

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