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आपको भी सैर (Sair) उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं! सैर त्यौहार मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश (विशेषकर मंडी, कुल्लू, शिमला, सोलन और कांगड़ा) के साथ-साथ उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े उल्लास से मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद माह के समापन और आश्विन (असोज) माह की संक्रांति के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। **ऐतिहासिक और पारंपरिक पृष्ठभूमि** * **बरसात की विदाई और धन्यवाद ज्ञापन:** पहाड़ों में बरसात का मौसम भारी भूस्खलन, बाढ़ और बीमारियों का जोखिम लेकर आता है। प्राचीन काल में दुर्गम रास्तों और संचार के अभाव में बरसात का सुरक्षित बीत जाना जीवन के एक नए चरण जैसा माना जाता था। इसलिए सैर पर्व मूल रूप से प्रकृति का आभार व्यक्त करने और सकुशल बचने की खुशी का प्रतीक है। * **खरीफ फसल की कटाई का आरंभ:** यह त्यौहार कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। खेतों में मक्की, धान और अन्य फसलें पकने की कगार पर होती हैं। किसान पहली फसल या मौसमी फल-अनाज देवताओं को अर्पित करते हैं। * **अखरोट और दूर्वा (दूब) की रस्म:** इस दिन नाई या पुरोहित घर-घर जाकर दूब (हरी घास) और मौसमी फल देते हैं, जिसे दीर्घायु और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। बदले में उन्हें अनाज और दक्षिणा दी जाती है। * **पारंपरिक खान-पान:** इस दिन घर-घर में विशेष पहाड़ी पकवान बनते हैं, जैसे अरबी के पत्तों से बने 'पतरोड़ू' (पतरौड़े), बबरू, पूड़े और खीर। * **सैर मेलों की परंपरा:** इतिहास में कई रियासतों में इस दिन से पशु मेलों और कुश्ती (छिंज) का आयोजन शुरू होता था, जो व्यापार और सामाजिक मिलन का प्रमुख साधन बनते थे। सोलन के अर्की में होने वाला सांडों का पारंपरिक दंगल भी इसी उत्सव का एक ऐतिहासिक हिस्सा रहा है। यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, आपसी भाईचारे और बदलते मौसम के स्वागत का सुंदर संदेश देता है।

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