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23.12.2025 संसार में कुछ लोग दुखी हैं, और कुछ लोग सुखी हैं। *"जो लोग दुखी हैं, उनमें से कुछ लोग अपने दुख के कारणों को जानते हैं। वे पुरुषार्थ करके उन कारणों को दूर कर लेते हैं। परिणाम स्वरूप उनके बहुत से दुख दूर हो जाते हैं, और वे सुखी हो जाते हैं।"* परंतु जो लोग अपने दुखों के कारणों को नहीं जानते, वे उन्हें दूर ही नहीं कर पाते और अपने दुखों से छूट भी नहीं पाते। *"यदि आप भी कुछ क्षेत्रों में दुखी हों, और अपने उन दुखों से छूटना चाहते हों, तो अपने दुखों के कारणों को ढूंढ ढूंढ कर उन्हें दूर कर लीजिए। आपके भी बहुत से दुख दूर हो जाएंगे, और आप भी सुखी हो जाएंगे।"* आप जिन दुखों से ग्रस्त हैं, उनके दो बड़े बड़े कारण इस प्रकार से हैं। एक तो यह, कि *"जो अच्छे लोग हैं, आप उनमें दोष ढूंढते रहते हैं।"* आप किसी व्यक्ति के बारे में ऐसा सोचते हैं, कि *"यह अच्छा आदमी है, लोग इसकी प्रशंसा करते हैं। यह सब प्रकार से सुखी है। तो आपसे उसका सुख सहन नहीं होता।" "इसलिए आप उसके अंदर दोष ढूंढते रहते हैं। ताकि इसके दोष ढूंढ कर इसके विषय में कुछ दुष्प्रचार किया जाए, जिससे कि इस व्यक्ति का सुख नष्ट हो जाए।"* यह आपकी मनोवृत्ति खराब है। इस कारण से आप दुखी रहते हैं। *"मिथ्या दुष्प्रचार करने से उस अच्छे व्यक्ति का तो कुछ नहीं बिगड़ता। परंतु आप उसका सुख देख देखकर अपनी ही दूषित मनोवृत्ति के कारण व्यर्थ ही मन में दुखी होते रहते हैं।"* इसका समाधान यह है, कि *"अच्छे लोगों के अंदर दोषों को न ढूंढें, बल्कि उनके गुणों को अपने अंदर धारण करें। इससे आपकी मनोवृत्ति अच्छी हो जाएगी तथा आप सुखी हो जाएंगे।"* आपके दुखों का दूसरा कारण यह है, कि *"जो खराब लोग हैं। आप भी उनके विषय में यह बात जानते हैं, कि "इन लोगों ने मेरे साथ पहले भी अच्छा व्यवहार नहीं किया। ये दुष्ट लोग हैं।" इतना जानने पर भी, आप भविष्य में अपने लिए उनसे उत्तम व्यवहार की आशा रखते हैं।"* आपकी यह भूल, आपके दुखों का दूसरा कारण है। इसका समाधान -- *"जिनका परीक्षण आप कर चुके हैं, कि ये दुष्ट लोग हैं। फिर भी आप उनसे अच्छे व्यवहार की आशा रखते हैं। यह तो बुद्धिमत्ता नहीं है।"* बुद्धिमत्ता का प्रयोग करें। *"यदि आप ऐसे खराब लोगों से उत्तम व्यवहार की आशा छोड़ दें, उनसे कुछ दूरी बना लें, तथा जो अच्छे लोग हैं, उनके संपर्क में रहें, उनके साथ उठना बैठना लेना-देना खाना पीना आदि व्यवहार रखें, तो निश्चित रूप से आपकी मनोवृत्ति शुद्ध हो जाएगी। आपके दुख बहुत कम हो जाएंगे, और आप सुखी हो जाएंगे।"* ---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*

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