
Lal Singh 🇮🇳🇮🇳
112 days ago
*अमृत कथा* 🦋गुरु की महिमा: देवर्षि नारद और मछुआरे की कथा🦋 🍀एक समय की बात है, देवर्षि नारद भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ धाम पहुँचे। श्री हरि ने नारद जी का भव्य स्वागत किया और उन्हें उचित सम्मान दिया। विदा होने के समय, जब नारद जी कक्ष से बाहर निकले, तो उन्होंने छिपकर सुना कि भगवान विष्णु माता लक्ष्मी से कह रहे हैं, "देवी, जिस स्थान पर नारद बैठा था, उस स्थान को तत्काल गाय के गोबर से लीप कर पवित्र कर दो।" यह सुनकर नारद जी स्तब्ध रह गए। वे तुरंत वापस लौटे और रुंधे गले से पूछा, "प्रभु! एक ओर आपने मेरा इतना सत्कार किया और दूसरी ओर मेरे प्रस्थान के बाद उस स्थान को अपवित्र मानकर साफ करने का आदेश दिया? ऐसा क्यों?" भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "नारद! अतिथि और देवर्षि होने के नाते आपका सम्मान मेरा धर्म था। किंतु, आध्यात्मिक दृष्टि से आप 'निगुरा' (बिना गुरु के) हैं। जिस स्थान पर गुरुहीन व्यक्ति बैठता है, वह स्थान अपनी सात्विकता खो देता है।" गुरु की खोज नारद जी को अपनी भूल का आभास हुआ। उन्होंने पूछा, "प्रभु, मैं गुरु किसे बनाऊं?" विष्णु जी ने आज्ञा दी, "पृथ्वी लोक पर जाओ। जो व्यक्ति तुम्हें सबसे पहले मिले, उसे ही अपना गुरु स्वीकार कर लो।" धरती पर उतरते ही नारद जी की भेंट एक साधारण मछुआरे से हुई। नारद जी दुविधा में पड़ गए। उन्होंने सोचा, "यह अनपढ़ मछुआरा मुझे क्या सिखाएगा?" वे वापस वैकुंठ गए और अपनी शंका व्यक्त की। तब भगवान ने कड़े स्वर में कहा, "नारद, अपने प्रण से पीछे मत हटो। गुरु की योग्यता नहीं, शिष्य का समर्पण देखा जाता है।" विवश होकर नारद जी ने उस मछुआरे को अपना गुरु बनाया। गुरु बनने के बाद भी नारद जी के मन में मछुआरे के प्रति अनादर बना रहा। उन्होंने पुनः विष्णु जी से जाकर कहा, "प्रभु, मेरे गुरु को तो स्वयं कुछ नहीं आता, वे मेरा उद्धार कैसे करेंगे?" श्राप और समाधान गुरु की निंदा सुनकर भगवान विष्णु क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा, "नारद! तुम गुरु-निंदा के अपराधी हो। मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम्हें 84 लाख योनियों के चक्र में भटकना पड़ेगा।" भयभीत होकर नारद जी ने क्षमा मांगी और इस श्राप से बचने का उपाय पूछा। भगवान ने कहा, "इसका उपाय भी तुम्हें तुम्हारे गुरु ही बता सकते हैं।" नारद जी भागते हुए अपने गुरु (मछुआरे) के पास पहुँचे और पूरी घटना सुनाई। गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, "वत्स! घबराओ मत। भगवान से कहना कि वे धरती पर ही 84 लाख योनियों के चित्र बना दें। तुम उन चित्रों के ऊपर लेटकर गोल घूम लेना और कहना कि प्रभु, मैं 84 लाख योनियों में घूम आया हूँ, अब मुझे क्षमा करें।" नारद जी ने वैसा ही किया। उनकी चतुराई और गुरु की युक्ति देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए। उन्होंने कहा, "नारद! देखा? जिस गुरु को तुम अज्ञानी समझ रहे थे, उन्हीं की शरण ने तुम्हें मेरे श्राप से बचा लिया। यही गुरु की महिमा है।" सीख इस प्रसंग का सार इन पंक्तियों में निहित है: गुरु गूंगे गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास, गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग की रखिये आस! चाहे गुरु का सांसारिक ज्ञान कम हो या वे साधारण दिखते हों, शिष्य का उनके प्रति अटूट विश्वास ही शिष्य का कल्याण करता है। जैसे भक्त धन्ना जाट ने अपने गुरु के दिए एक साधारण पत्थर में भगवान को पा लिया था, वैसे ही गुरु के वचनों पर अडिग

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