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प्रभु जगन्नाथ और बलराम का नगर भ्रमण पुरी नगरी आज बड़ी ही पावन और आनंदमय लग रही थी। आकाश में हल्की-हल्की धूप थी और हर दिशा में भक्ति की सुगंध फैल रही थी। मंदिर के द्वार खुले और ऐसा लगा मानो स्वयं देवता अपने भक्तों के बीच आने वाले हों। उसी समय प्रभु जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलराम नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े। सड़कों पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर कोई अपने प्रिय प्रभु की एक झलक पाने के लिए आतुर था। ढोल, मंजीरा और शंख की ध्वनि से पूरा नगर गूंज उठा। “जय जगन्नाथ!” और “बलराम जी की जय!” के स्वर वातावरण को और भी पवित्र बना रहे थे। प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े, करुणामय नेत्रों से भक्तों को निहार रहे थे। उनके चेहरे पर एक मधुर मुस्कान थी, मानो वे हर भक्त का दुःख समझ रहे हों। उनके साथ बलराम जी अपने गंभीर और दिव्य स्वरूप में चल रहे थे। उनके चेहरे पर शक्ति और करुणा दोनों की झलक दिखाई दे रही थी। नगर के लोग अपने घरों की छतों से फूल बरसा रहे थे। बच्चे हाथ जोड़कर खड़े थे और वृद्ध श्रद्धा से आँसू बहा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा नगर ही प्रभु के प्रेम में डूब गया हो। प्रभु जगन्नाथ और बलराम जब भी किसी भक्त की ओर देखते, उस भक्त का हृदय आनंद से भर जाता। कई लोग अपने मन की प्रार्थना प्रभु से कह रहे थे, तो कई बस उन्हें निहार कर ही धन्य हो रहे थे। नगर की गलियों में चलते हुए प्रभु मानो यह संदेश दे रहे थे कि वे केवल मंदिर में ही नहीं, बल्कि हर भक्त के हृदय में निवास करते हैं। उनके इस नगर भ्रमण से हर व्यक्ति के मन में भक्ति और विश्वास की नई ज्योति जल उठी। धीरे-धीरे संध्या होने लगी और आकाश में सुनहरा रंग छा गया। प्रभु जगन्नाथ और बलराम अपने मंदिर की ओर लौटने लगे, पर उनके दर्शन की मधुर स्मृति हर भक्त के हृदय में सदा के लिए बस गई। उस दिन पुरी नगरी ने फिर से अनुभव किया कि जब प्रभु स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं, तब हर गली, हर हृदय और पूरा संसार ही एक दिव्य उत्सव बन जाता है। 🙏✨

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